सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—1
झठार्थ तम भंजनम्
सनातन परम्परा मे मूर्ति पूजा का बेहद महत्त्व है। आस्तिक एवं नास्तिक दो
विचारकों में जो ईश्वर को मानता है। वह आस्तिक एवं जो नहीं मानता व नास्तिक कहलाता
है। एवं वेद के सभी विद्वानों ने मूर्त्ति पूजा को आस्तिक विचारधारा की श्रेणी में
रखा है। ये सम्भव है कि कुछ ने मूर्त्ति पूजा को अनुचित माना है किन्तु वे निराकार उपासक भी मूर्त्ति पूजकों को नास्तिक नहीं कह सके।
वेदव्यास, शंकराचार्य,रामानन्दाचार्य, गौड़पादाचार्य, वल्लभाचार्य आदि सभी आचार्यों ने मूर्ति पूजा
का समर्थन किया। ये सभी वेदों व उपनिषदों के पारगामी विद्वान् थे एवं इनके सारे
मतों की स्थापना वेद के मन्त्रों के आधार पर प्रमाणित हैं। यही कारण है कि शैव, शाक्त, वैष्णव, सौर्य, गाणपत्य आदि जितने मत
मतान्तर प्रचलन में आये एवं उन्होंने महान् भारत में अपनी स्थापना करने में सफलता
प्राप्त की तो उनके लिये सर्व प्रामाणिक ग्रन्थ वेद ही थे। वेद की ही ऋचाओं व
मन्त्रों को उन्होंने अपने दर्शन में प्रमाण माना। अत: किसी भी विचारधार की
प्रामाणिकता तभी स्वीकार्य होती है, जब उस मत के स्थापक वेद
की ऋचाओं, ब्राह्मण ग्रन्थेां व उपनिषदों स्मृतियों व
पुराणों के आधार पर अपने सिद्धान्त की स्थापना करता है। यदि कोई दर्शन अथवा
विचारधारा वेद का प्रमाण नहीं मानती तो उसे नास्तिक कहा जाता है। इस सन्दर्भ में
मनु का उदाहरण है— नास्तिको वेद निन्दक:
अब ये प्रश्न है कि आधुनिक वेद विचारकों में से मात्र एक केा मूर्त्ति पूजा के
विरोध का विचार हुआ है। उसके अनुचर भी
उन्हीं की तरह बातें करते हैं। एवं विरेाध आदि कुतर्क करते हैं। हमारी दृष्टि मे
हम उन्हें वेद के पाखण्डी भक्त कहते हैं। अथवा उन्हें जनेऊ धारी म्लेच्छ भी कहा जा
सकता है।
मूर्त्ति पूजा विरोधियों का एक ग्रन्थ है उसकी अनुक्रमणिका में ही आस्तिक नास्तिक विभाजन में चार्वाकों, बौद्धों व जैनों को नास्तिकों की श्रेणी में रखा है। इस द्वादश अध्याय से पूर्व किसी भी
मूर्त्ति पूजक को नास्तिक नहीं कहा है। तो जहाँ से ग्रन्थ का वर्गीकरण प्रारम्भ
होता है। वहीं से लेखक के मन में यह स्पष्ट है कि मूर्त्ति पूजा व मूर्त्ति पूजक
नास्तिक नहीं है। एवं इस प्रकार से जो ईश्वर की साधना कर रहा है। वह साधक आस्तिक
है। यदि ऐसा नहीं होता तो पुस्तक के लेखक महोदय नास्तिक समुल्लासों में पुराण
समर्थक विचारकों को भी नास्तिकों के साथ ही रखते। अपितु उन्हेांने ऐसा नहीं करके
आस्तिक खण्ड में उनका विरोध किया है। उन्हें नास्तिक नहीं माना है।
यहाँ आज मूर्त्ति पूजा व पुराणों के मण्डन विषयक चर्चा की यह प्रथम स्थापना
है। मेरा प्रयास यही रहेगा कि मैं सनातन आर्य शास्त्रो के प्रमाणों से पूर्व
उन्हीं पाखण्डी पुस्तकों एवं सोशल साईटों पर हमारे पुराण आदि धर्मशास्त्रों के
सन्दर्भ में अनर्गल प्रलाप पूर्ण रूप से उत्पन्न प्रश्नों में व्याप्त
विप्रतिपत्तियों को उजागर किया करूँ जिससे स्वयमेव ही सिद्ध हो जायेगा कि जो
सनातनी आर्य ग्रन्थो स्मृतियों व पुराणों के सन्दर्भ में जो उस पुस्तक में कहा गया
है। वह मिथ्या है।
वस्तुत: मूर्ति पूजा एवं पुराणों का विरोध जहाँ जहाँ अथवा जिसके द्वारा किया
जा रहा है। वे सभी संस्थान जाने अनजाने हिन्दू धर्म, आर्य विचारधारा,
वैदिकज्ञान, भारतीय परम्परा एवं संस्कृति व भारत देश के शत्रु हैं।
सत्यता ये है कि जब से भारत में वेदेतर समाज का प्रादुर्भाव हुआ तभी से
उन्होंने मूल वैदिक ज्ञान जो कि वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, वेदांग, दर्शन, स्मृतियों एवं पुराणों आदि के रूप हमारे पास सुरक्षित है।
उसका एवं उस पर आधारित मूर्त्ति पूजा आदि साधना पद्धतियों का विरोध करना प्रारम्भ
कर दिया। इसी प्रकल्प में जब बाहर से बर्बर आक्रमणकारियों में सम्मेलन हुआ तब
इसमें अधिक वृद्धि हुई । उस पर जब धर्मान्तरण वाली गुण्डी गैंग का पर्दापण हुआ तो
फिर तो उसमें शतगुना बढ़ोतरी हुई। वर्तमान में कई लोग इस प्रकार के कार्य में लगे
हुये हैं।
इसीलिये मेरे मन में यह विचार जाग्रत हुआ कि शास्त्रों में प्रदत्त तर्कों के
आधार इनके झूठ को सभी के सामने प्रस्तुत किया जाय।
इसी हेतु प्रयत्नशील हुआ हूँ। आप सभी का सहयोग एवं प्रतिक्रिया अपेक्षित है।
क्रमश:
डॉ.दिलीप कुमार नाथाणी (D.Litt. Sanskrit)
