शुक्रवार, 9 दिसंबर 2022

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—8


सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—8


 वेद कहने मात्र से वेदार्थ का ज्ञान नहीं हो सकता। इसके लिये आवश्यक है गुरु—शिष्य परम्परा से उसका अध्ययन किया जाय। वर्तमान में गुरुकुल नहीं होने से वेद का अध्ययन करना सहज नहीं है। अत: वेदों के आधुनिक युग के प्रथम भाष्य के रूप में पुराणों का अध्ययन किया जा सकता है। पुराणों में ही वेद के अर्थ को प्रकट किया गया है। भगवान् के ज्ञानावतार श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यास जी ने पुराणों में वेद के अर्थ को ही प्रकट किया। अथवा जिसे कहा जाय कि पुराण विद्या वह विद्या है जिसके माध्यम से वेदों के अर्थ को सरलतया समझा जा सकता है। 

वेद नाम पर पाखण्ड करने वाले का कुतर्क:—  

ज्योतिशास्त्र में अंक, बीज, रेखागणित विद्या है, वह सब सच्ची है जो फल (फलित) की लीला है, वह सब झूठी है। ऐसा कहते हुये अब ये वेद नाम का आवरण ओढ़े हुये पाखण्डी महोदय ब्राह्मणों की आलोचना करना प्रारम्भ करते हैं। एवं जन्मपत्रिका देख कर धनाढ्य लोगों के साथ छल करते हुये धन हरण करते थे।

सत्य सनातन सिद्धान्ती द्वारा कुतर्कोपशमनम्:—

  इस प्रकार के मिथ्या आरोपों के लिये दु:खवश मन में यही शब्द आते हैं— अब्रह्मण्यम्! अब्रह्मण्यम्! अब्रह्मण्यम्! 

वेद के नाम पर पाखण्ड फैलाने वाले सत्य सनातन आर्य धर्म विरोधी महोदय ये भूल गये कि पूर्व में ये महोदय हिन्दूओं के किसी अन्य वर्ण को नीच बता आये अब किसी अन्य वर्ण को छद्मकारी बताते हैं। अब बतायें कि इन जैसे महानुभव को हिन्दू एवं सत्य सनातन संस्कृति विरोधी नहीं कहा जाय तो क्या कहा जाय? खैर ये पाठक की स्वेच्छा पर निर्भर है।

 हमारा उद्देश्य तो झूठार्थ तम भंजन करना है। तो अब ज्येातिष पर चर्चा करें तो ज्योतिष के तीन प्रधान स्कन्ध बताये गये हैं, गणित, फलित, एवं प्रश्न या होरा इनमें से गणित पर ही फलित एवं प्रश्न ज्योतिष आधारित है। वैसे मेने यहाँ ज्योतिष सम्बन्धित अत्यन्त सूक्ष्म परिचय दिया है। सम्भवत: ज्येातिष के विद्वान् इस पर अधिक प्रकाश डाल सकते हैं। पर कुतर्की स्वयं कह रहा है कि अंक, बीज, रेखागणित सही है फलित मिथ्या है। यह कैसे हो सकता है? जब फलित, गणित आदि प्रायोगिक सिद्धान्तों पर आधारित है तो वह लीला कैसे हो सकती है? अथवा झूठी कैसे हो सकती है? यहाँ महाभारत का एक प्रसंग बताना आवश्यक है। शिव पार्वती संवाद के रूप में—

पार्वती:— प्रभु ये मानव विभिन्न प्रकार के कष्ट प्राप्त करने से बचने के लिये विभिन्न ग्रहों की उपासना क्यों करते हैं? क्या जन्मपत्री में स्थित ग्रहों की उपासना से उनका कल्याण होगा?

शिव:— देवी जन्मपत्रिका में स्थित ग्रह मानव के इस जन्म में होने वाली उन घटनाओं का विवरण प्रस्तुत करते हैं, जो मानव ने अपने पूर्वजन्म के कर्मों के आधार पर भागय रूप में प्राप्त  की हैं। अथवा पूर्व जन्म के कर्मानुसार उन्हें क्या फल मिलने वाला है उसकी जानकारी जन्मपत्रिका के ग्रहों से हमें ज्ञात होती है। 

इस संवाद से ये स्पष्ट हो जाता है कि जन्मपत्रिका जो कि गणितीय कलनाओं के आधार पर बनाई जाती है। उसमें स्थित ग्रह मनुष्य के पूर्वकर्मानुसार प्राप्त होने वाले फलों को दर्शाते हैं। 

इस सन्दर्भ में एक अन्य तर्क है कि ज्येातिष छ: वेदांगों में से एक अंग है। एवं इसकी उत्पत्ति का कारण बताते हुये ऋषि कहते हैं कि यज्ञोंं के शुभ समय को ज्ञात करने के लिये ही ज्योतिष की उत्पत्ति हुई इसीलिये इसे चक्षु भी कहा है। 

वेद के नाम पर पाखण्ड करने वाले महोदय एक स्थान पर तो स्वयं ही वेदांग को आवश्यक शिक्षा मानते हैं। वही स्वयं ही ज्योतिष को आधा सही आधा असत्य बता रहे हैं। अब पाठक स्वयं निर्धारित करें कि वे किस पक्ष को उचित मानेंगे। 

जन्म पत्रिका देखने वाले बहुधा शोकिया तोर पर देखते हैं। एवं उनके उपचार विभिन्न प्रकार के वैदिक मन्त्रों का जप करने के विधान बताये जाते हैं। एवं यज्ञों का विधान बताया जाता है। किन्तु जिनके लिये वेद, पुराण, रामायण, महाभारत, वेदांग, दर्शन आदि से बढकर उनके सम्प्रदाय की एक पुस्तक श्रेष्ठ है तो उनके लिये सारे तर्क ही व्यर्थ हैं। 

ज्योतिष पर पराशर ऋषि, समुद्र ऋषि, आदि अनगिनत ऋषियों ने अत्यन्त सूक्ष्म विवेचना प्रस्तुत की है। उन ग्रन्थेां को न तो सम्प्रदाय के अधिष्ठाता महोदय ने पढ़ा एवं न ही उनके अन्धानुगामियों ने पढ़ा तो उसका क्या उपचार हो सकता है? ये पाठक स्वयं निर्धारित करें।

जाका गुरू भी आंधला शिष्य खड़ा निरन्ध। 

आंधा आंधे ठेलिया कूप मह पणंत।

सत्य सनातन आर्य वैदिक परम्परा में मूर्त्ति पूजा एक साधन माना गया है। वेदों में विभिन्न स्थानों पर सारी दैविक शक्तियों के स्वरूप वर्णन के असंख्य श्लोक हमें प्राप्त होते हैं। बृहस्पति, अग्नि, वरूण, इन्द्र, अश्विनीकुमार आदि विभिन्न देवताओं के स्वरूपों का वर्णन हमें वेदों में सरलतया प्राप्त होता है। अब एक महोदय खड़े हुये उन्होंने वेदों को तो व्याकरण आदि के आधार पर पढ़ लिया एवं उन वेदों के व्याख्या ग्रन्थ पुराणों आदि का पढ़ा नहीं और प्रारम्भ हुये ईश्वर के अवतार की आलोचना करने। जैसे जैसे ये मूर्त्ति पूजा मण्डनम् एवं पुराण स्थापना के अन्तर्गत हम झूठार्थ तम भंजनम् कर रहे हैं। वैसे वैसे मूर्त्ति पूजा विरोधियों में अधैर्य, बैचेनी एवं अन्य मानसिक रोग उठने प्रारम्भ हो रहे हैं। 


डॉ. दिलीप कुमार नाथाणी विद्यावाचस्पति

 

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—7


 सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—7


कुछ वेद पाखण्डी जो कल पैदा हुये उन्होंने अपने अहंकार एवं अपने मत व सम्प्रदाय की स्थापना के लिये के लिये अँग्रेजों से प्राप्त धन व सहायता के आधार पत्रक छपवा कर बाँटे जिसमें  परम्परया लक्षाधिक वर्षों से प्रचलित ज्योतिष शास्त्र को एवं हनुमान्, भैरव तथा भगवती पराम्बा को झूठा सिद्ध करने का कुतर्क प्रस्तुत करते हुये कहा कि— 

वेद नाम पर पाखण्ड करने वाले का कुतर्क— ये सब मिथ्या है, एवं यदि किसी को भूत बाधा हो तो उपरोक्त में से किसी देव या देवी के सिद्ध साधक के पास जाकर उपचार करवाये तो वह साधक निम्न जाति का है एवं उसे पैसे, मदिरा एवं माँस देकर अपना धन नष्ट करते हैं एवं रोग बढ़ाते हैं। 

सत्य सनातन सिद्धान्ती:— सर्वप्रथम यहाँ ये लोग उच्च व निम्न जाति के भेद को उत्पन्न कर रहे हैं। एवं उसके लिये जो वे मदिरा, वस्त्र मिठाई, माँस आदि की माँग सम्बन्धी विचार प्रस्तुत कर रहे हैं तो निश्चित ही वे अपने मत को सिद्ध करने के लिये ऐसे ही किसी अपराधी के पास गये होंगे अथवा गये भी या नहीं वे ही जाने। परन्तु सत्य तो यह है कि हनुमान्, भगवती पराम्बा, भैरव आदि की उपासना करने वाले बहुतायात में दूध की बनी हुई वस्तुओं का प्रसाद रूप में प्रयोग करते हैं। एवं जिन—जिन स्थानों पर ऐसे साधक बैठे हैं चाहे सालासर बालाजी, अथवा अजमेर के निकट श्मशान भैरव वहाँ आपसे आपके कष्ट निवारणार्थ किसी से कोई पेैसे, वस्त्र, धन, मदिरा, माँस आदि नहीं लिये जाते। यही नहीं, वहाँ श्मशान भैरव का साधक कोई तथाकथित किसी निम्न अथवा उच्च वर्ण का  है अथवा नहीं परन्तु एक उद्योगपति अवश्य है। एवं वहाँ मानव मात्र के कल्याण के लिये साधना करते हुये कुछ समय बिताकर पुन: अपने व्यापार में व्यस्त हो जाते हैं। परन्तु किसी वेद के नाम पर पाखण्ड फैलाने वाले लोगों में सत्य को स्वीकारने व देखने की शक्ति नहीं होने से कोई वहाँ जाकर सत्य नहीं देखता। 

अब हम आते हैं कि ये देवी देवता क्या हैं? तो इसका समाधान करेंगे कि ये वास्तव में प्राणात्मक ऊर्जा का स्वरूप है। जिसे पण्डित मधुसूदन ओझा जी, पण्डित मोतीलाल शास्त्री जी ने इस ऊर्जा को व्यापकता के साथ वेद विज्ञान के आधार पर समझाया है। परन्तु अँग्रेजों द्वारा  हिन्दू समाज में  आपस में वैर उत्पन्न करके हानि पहुँचाने के लिये बने सम्प्रदाय के लोगों के मन में ये सत्य कदापि नहीं आ सकता। क्योंकि अँग्रेजों द्वारा प्रदत्त धन सहायता के लिये इन्हें निष्ठावान् बनना होगा। इसीलिये ये वेद नाम के आवरण को ओढ़ कर सत्य सनातन हिन्दू धर्म की बुराईयाँ ही करेंगे।

यहाँ इन मूर्खों को ये बताया जाय कि आयुर्वेद में शरीर की कई प्रकार की चिकित्साओं में से भूत चिकित्सा का भी वर्णन प्राप्त होता है। अन्य किसी प्रकार के असन्तुष्ट आत्मा के मोक्ष सम्बन्धी वर्णन भागवत् महापुराण में प्राप्त होता है। जहाँ ब्राह्मण द्वारा भागवत् पाठ एवं दान मात्र का उल्लेख है। एवं उसमें पुरूष सूक्त से यज्ञ का भी विधान बताया गया है। अब उसमें कहाँ वस्त्र, धन, मिष्टान्न, मदिरा, माँस आया। किन्तु इन कुतर्कियों के पास कदापि उत्तर नहीं है।

 अपितु ब्राह्मणों का भी विरोध करने लगे क्योंकि उनसे शास्त्रार्थ में हार जो गये। अपनी हार के सत्य को ये कभी उद्घाटित नहीं करते। भारत से बाहर के लोगों ने चाहे वे मुगल हों या ईसाई(अँग्रेज) उन्होंने ब्राह्मणों की हत्या की किन्तु उन्हें पोंगा पण्डित नहीं कहा उसका कारण स्पष्ट था कि उन्हें ज्ञात था कि जब तक ब्राह्मण हैं उनके तथाकथित धर्मों की स्थापना नहीं हो सकती।

सत्य सनातन भारतीय वैदिक संस्कृति ही हम हिन्दूओं की संस्कृति है। इसमें वेद, स्मृति व पुराण ही  प्रमाण के रूप में मान्य हैं। इनमें वेद सर्वोपरि है तदुपरान्त स्मृति तथा अन्त में वेदों के भाष्य रूप में जाने जाने वाले पुराण माने गये हैं।

 

डॉ. दिलीप कुमार नाथाणी विद्यावाचस्पति


शुक्रवार, 2 दिसंबर 2022

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—6



सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—6



कुछ वेद पाखण्डी जो कल पैदा हुये उन्होंने अपने अहंकार एवं अपने मत व सम्प्रदाय की स्थापना के लिये के लिये अँग्रेजों से प्राप्त धन व सहायता के आधार एक पुस्तक लिखी जिसमें 

उन्होंने छपवाया कि  परम्परया लक्षाधिक वर्षों से प्रचलित ज्योतिष शास्त्र को एवं हनुमान्, भैरव तथा भगवती पराम्बा को झूठा सिद्ध करने का कुतर्क प्रस्तुत करते हुये कहा कि— 


वेद नाम पर पाखण्ड करने वाले का कुतर्क— ये सब मिथ्या है, एवं यदि किसी को भूत बाधा हो तो उपरोक्त में से किसी देव या देवी के सिद्ध साधक के पास जाकर उपचार करवाये तो वह साधक निम्न जाति का है एवं उसे पैसे, मदिरा एवं माँस देकर अपना धन नष्ट करते हैं एवं रोग बढ़ाते हैं। 

सत्य सनातन सिद्धान्ती:— सर्वप्रथम यहाँ ये महोदय उच्च व निम्न जाति के भेद को उत्पन्न कर रहे हैं। एवं उसके लिये जो वे मदिरा, वस्त्र मिठाई, माँस आदि की माँग सम्बन्धी विचार प्रस्तुत कर रहे हैं तो निश्चित ही वे अपने मत को सिद्ध करने के लिये ऐसे ही किसी अपराधी के पास गये होंगे अथवा गये भी या नहीं वे महात्मा ही जाने। परन्तु सत्य तो यह है कि हनुमान्, भगवती पराम्बा, भैरव आदि की उपासना करने वाले बहुतायात में दूध की बनी हुई वस्तुओं का प्रसाद रूप में प्रयोग करते हैं। एवं जिन—जिन स्थानों पर ऐसे साधक बैठे हैं चाहे सालासर बालाजी, अथवा अजमेर के निकट श्मशान भैरव वहाँ आपसे आपके कष्ट निवारणार्थ किसी से कोई पेैसे, वस्त्र, धन, मदिरा, माँस आदि नहीं लिये जाते। यही नहीं, वहाँ श्मशान भैरव का साधक कोई तथाकथित किसी निम्न अथवा उच्च वर्ण का  है अथवा नहीं परन्तु एक उद्योगपति अवश्य है। एवं वहाँ मानव मात्र के कल्याण के लिये साधना करते हुये कुछ समय बिताकर पुन: अपने व्यापार में व्यस्त हो जाते हैं। परन्तु किसी वेद के नाम पर पाखण्ड फैलाने वाले लोगों में सत्य को स्वीकारने व देखने की शक्ति नहीं होने से कोई वहाँ जाकर सत्य नहीं देखता। 

अब हम आते हैं कि ये देवी देवता क्या हैं? तो इसका समाधान करेंगे कि ये वास्तव में प्राणात्मक ऊर्जा का स्वरूप है। जिसे पण्डित मधुसूदन ओझा जी, पण्डित मोतीलाल शास्त्री जी ने इस ऊर्जा को व्यापकता के साथ वेद विज्ञान के आधार पर समझाया है। परन्तु अँग्रेजों द्वारा  हिन्दू समाज में  आपस में वैर उत्पन्न करके हानि पहुँचाने के लिये बने सम्प्रदाय के लोगों के मन में ये सत्य कदापि नहीं आ सकता। क्योंकि अँग्रेजों द्वारा प्रदत्त धन सहायता के लिये इन्हें निष्ठावान् बनना होगा। इसीलिये ये वेद नाम के आवरण को ओढ़ कर सत्य सनातन हिन्दू धर्म की बुराईयाँ ही करेंगे।

यहाँ इन मूर्खों को ये बताया जाय कि आयुर्वेद में शरीर की कई प्रकार की चिकित्साओं में से भूत चिकित्सा का भी वर्णन प्राप्त होता है। अन्य किसी प्रकार के असन्तुष्ट आत्मा के मोक्ष सम्बन्धी वर्णन भागवत् महापुराण में प्राप्त होता है। जहाँ ब्राह्मण द्वारा भागवत् पाठ एवं दान मात्र का उल्लेख है। एवं उसमें पुरूष सूक्त से यज्ञ का भी विधान बताया गया है। अब उसमें कहाँ वस्त्र, धन, मिष्टान्न, मदिरा, माँस आया। किन्तु इन कुतर्कियों के पास कदापि उत्तर नहीं है।

 अपितु ब्राह्मणों का भी विरोध करने लगे क्योंकि उनसे शास्त्रार्थ में हार जो गये। अपनी हार के सत्य को ये कभी उद्घाटित नहीं करते।

सत्य सनातन भारतीय वैदिक संस्कृति ही हम हिन्दूओं की संस्कृति है। इसमें वेद, स्मृति व पुराण ही  प्रमाण के रूप में मान्य हैं। इनमें वेद सर्वोपरि है तदुपरान्त स्मृति तथा अन्त में वेदों के भाष्य रूप में जाने जाने वाले पुराण माने गये हैं।

 

डॉ. दिलीप कुमार नाथाणी विद्यावाचस्पति


शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—5

 

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—5


पुराणों पर विभिन्न विचारकों को पढ़ने के साथ ही यह जानना एवं स्वीकारना भी आवश्यक है कि द्वापर युग की समाप्ति के उपरान्त का कुछ भाग अन्धकारमय है। भारत में बर्बर व आतंकवादी सम्प्रदायों के द्वारा पिछले 1300 वर्षों में व्यवस्थित रूप से बहुत सारा साहित्य जला दिया गया इसका परिणाम यह रहा है कि हमारे पुराणों से सम्बन्धित साहित्य तथा वेद की विभिन्न शाखाओं व ब्राह्मण ग्रन्थों तथा आरण्यकों आदि से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण साहित्य नष्ट कर दिया गया है। 

 भारतीय इतिहास के सन्दर्भ में कई प्रमाण व साक्ष्य नष्ट कर दिये गये। विशेष कर म्लेच्छों के काल में बहुत साहित्य नष्ट कर दिया गया। एवं तात्कालिक धर्मविरोधी उन्माद की स्थिति में हमारे विद्वानों ने धर्मशास्त्रीय दर्शन की सुरक्षा को आवश्यक माना इसीलिये उनकी प्रतिलिपियाँ होती रहीं एवं भारत के लगभग सभी आर्य नरेशों के पुस्तकालय में सुरक्षित रही जो वर्तमान में पढने में आ रही हैं। इसी माध्यम से कथमपि अपने साहित्य की अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण साहित्य रचनाओं का सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया। किन्तु जो हम क्षेत्रीय स्तर के साहित्य की चर्चा करें तो बहुत सा ऐसा क्षेत्रिय स्तर पर लिखा गया साहित्य नष्ट ही हो गया।

आप सभी जो नित्य पढ़ रहे हैं  इस शृँखला को उनके लिये आज का संवाद किंचित् विषय से हट कर है। किन्तु पूर्व के सारे संवाद में कुछ प्रश्न उठे जिनके उत्तर देने आवश्यक हैं।

1.शंकराचार्य ने भी परापूजा नामक एक ग्रन्थ लिखा जिसमें निराकार ब्रह्म की उपासना का वर्णन मिलता है। अत: शंकराचार्य को तो सनातनी मानते हैं फिर वे मूर्त्तिपूजा क्यों करते हैं?

समाधान:— द्वापर युग के बाद कलियुग में शंकराचार्य प्रथम हुये हैं जिन्होंने तात्कालिक समय में उपलब्ध सम्पूर्ण सनातन आर्ष संस्कृत साहित्य को संकलित किया उसकी पुन: स्थापना की। ऐसे में उन्होंने वेदों में वर्णित निराकार व साकार ब्रह्म देानेां की साधना विधि को प्रकाशित किया। षडविंशब्राह्मण का प्रथम सूत्र ही ये है— ''ब्रह्म च वा इदमग्रे सुब्रह्म चास्ताम्।।1।।'' सर्ग के आदि मे ब्रह्म व सुब्रह्म सर्वप्रथम हुये। इसमें ब्रह्म यानि परात्पर ब्रह्म जो अनिर्वचनीय हैं। उसे साकार अथवा निराकार दोनों में से किसी भी शब्द से नहीं बताया जा सकता क्योंकि ये दोनों ही शब्द परस्पर विलोम शब्द है। एवं द्वितीय सुब्रह्म उसी परात्पर का दैवीय स्वरूप जिसकी यज्ञ से पूजा होती है। एवं साकार है इन दोनों में अभेद है। ये ब्राह्मण ग्रन्थों के वचन हैं। इनमें जो अविश्वास करता है। वह नास्तिक है क्येांकि नास्तिकों वेद निन्दक: ऐसा मनु कहते हैं।

शंकाराचार्य ने इसी षड्विंश ब्राह्मण के प्रथम सूत्र को लेकर साकार व निराकार उपासना को व्याख्यायित किया था।  

जगद्गुरू आदि शंकाराचार्य ने न केवल वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना की वरन्स्था मनुष्य जीवन के मोक्ष मार्ग के लिये प्रस्थान त्रयी के नाम से उपनिषद, ब्रह्मसूत्र व गीता को स्थापित किया। इसीलिये उनके द्वारा इन तीनो पर भाष्य प्राप्त होते हैं। ब्रह्मसूत्र के भाष्य में उन्होंने कई स्थलों पर प्रमाण के लिये यथा स्मृति: कहा है। वे अपने दर्शन के प्रमाण के रूप में धर्मशास्त्रों को मानते हैं। यथा पुराण व स्मृतियाँ आदि। ऐसे में वे मूर्त्ति पूजा के विरेाधी कैसे हो सकते थे। ईश्वर के जितने भी स्वरूप हैं शिव, विष्णु, सूर्य, गणपति, दैवी आदि इन सभी पर उन्होंने कई  स्तोत्रो की रचना की है। यही नहीं पंचदेवोपासना की भी पुनर्स्थापना ही शंकराचार्य ने की है। इनमें शिव, विष्णु, गणपति, सूर्य एवं शक्ति पाँच देवों के रूप में हैं। यही पंचदेवोपासना वर्तमान पर्यन्त अक्षुण्ण चली आ रही है। 

इसी प्रकार उन्होंने परात्परब्रह्म की साधना के लिये उपनिषदों के प्रमाण दिये वहीं उन्हेांने कई अन्य स्थलो से भी प्रमाण दिये। यही तथ्य परापूजा में प्राप्त होता है। एवं जिस मत की जहाँ स्थापना की जाती है वहाँ उस मत के मण्डन के साथ शेष सारे मतों का खण्डन भी किया जाता है। यही कारण रहा कि कुछ पाखण्डी वेद भक्तों को शंकराचार्य के लिये भ्रान्ति उत्पन्न हो गई।

 अब उनके कुछ नकली समर्थक उन्हें भी स्वयं की तरह पाखण्डी सिद्ध करने पर तुले हुये हैं। जगद्गुरू आदि शंकराचार्य को शिवावतार मानने में उनको भय लगता है। कि कहीं उनके द्वारा निराकार उपासना को झूठा ढकोसला बनाया हुआ है। वह टूट न जाय। इससे तो अच्छा है कि उन्हें माने ही नहीं। किन्तु ऐसा कहने पर तो पूरा समाज ही झूठा सिद्द्ध हो जायेगा। इसीलिये अच्छा है हम जगद्गुरू आदि शंकराचार्य को भी अपने समाज में ही मिला देते हैं। पर हमारे समाज की स्थापना तो कल हुई है। तो ठीक है जगद्गुरू आदि शंकराचार्य को  हमें निराकार सिद्ध कर देते हैं। ये सर्वविदित है इनसे बड़े कुतर्की सम्पूर्ण विश्व में नहीं मिलेंगे।

शंकराचार्य ने ही एक अत्यन्त मनोरम चेतावनी परक भजन लिखा है भज गाविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ मते। न हि न हि रक्षति डूकृंकरणे। ऐसे में यदि वे मूर्त्ति पूजा विरोधी  होते तो। भज गोविन्दं ही क्यों लिखते?

वेद के नाम पर पाखण्डी समाज का कुतर्की :—जगद्गुरु शंकराचार्य जी ने गीता पर पूरा भाष्य नहीं लिखा उनका प्रथम अध्याय पर कोई भाष्य उपलब्ध नहीं होता है

सनातनी:— शंकराचार्य जी का गीता भाष्य पूरा पढ़ा है?

वेद के नाम पर पाखण्डी समाज का कुतर्की :— हाँ पूरा पढ़ा है

सनातनी:—पूरा पढ़ने से तात्पर्य केवल अन्तिम पृष्ठ पढ़ना नहीं है मूर्ख! उसकी प्रथम पंक्तियाँ पढ़ी हैं?

वेद के नाम पर पाखण्डी समाज का कुतर्की :— नहीं उसमें ऐसा क्या है?

सनातनी:— उसी में ही प्रथम अध्याय की व्याख्या शंकराचार्य करते हुये कहते हैं कि प्रथम अथ्याय में जो मोह है उसकी व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है वह सामान्य रूप से सभी में है अत: अर्जुन को जो विशाद है उसकी भिन्न व्याख्या की आवश्यकता नहीं है इसीलिये द्वितीय अध्याय से ही प्रारम्भ करते हैं।

वेद के नाम पर पाखण्डी समाज का कुतर्की :— ऐसा लिखा है तो क्या हुआ?

सनातनी:— इसका तात्पर्य है कि जो यह अनर्गल प्रलाप प्रचारित किया हुआ है कि शंकराचार्य जी ने गीता के प्रथम अध्याय को माना ही नहीं है अथवा उस समय था ही नहीं प्रक्षेपित है आदि आदि जो अशास्त्रीय धारणाएँ प्रचारित करके शंकराचार्य का मूर्तिपूजा विरुद्ध बताने का षड्यन्त्र कर रहे हैं वह व्यर्थ है। तात्पर्य है कि शंकराचार्य जी के अनुसार प्रथम अध्याय में जो अर्जुन ने शंका रखी है वह जनसामान्य में स्वाभाविक है। अत: उसकी व्याख्या की आवश्यकता नहीं है। 


डा दिलीप कुमार नाथाणी (विद्यावाचस्पति)


बुधवार, 23 दिसंबर 2020

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना —4

 

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना —4

पुराणों की पौराणिकता, भारतीय धर्म दर्शन में उनकी प्रासंगिकता एवं भारतीय जनमानस में पुराणों का अन्तर्ग्रन्थन सम्बन्धी अभी कई तथ्य प्रस्तुत किये गये हैं। पुराणों के सन्दर्भ में भारतीयों में अन्य कई विद्वान् हुये हैं जिन्होंने इनकी पौराणिकता के सन्दर्भ में पर्याप्त तर्क सप्रमाण प्रस्तुत किये हैं। इनमें कल हमने कुछ विद्वानों को पढ़ा था। आज भी कुछ भारतीयों के प्रमाण प्रस्तुत कर पाश्चात्यों के मत प्रस्तुत करेंगे।

पाण्डुरंग वामन काणे:— महामहोपाध्याय पी.वी. काणे के अनुसार निरुक्त से प्रकट होता हैं कि यास्क से बहुत पहले रिक्थाधिकार (यानि हिस्सेदारी) के प्रश्न को लेकर विचार—विमर्श हुये तथा पुत्रों एवं पुत्रियों को रिक्थ—निषेध तथा पुत्रिका को अधिकार प्राप्त हो सकता है। रिक्थाधिकार सम्बन्धी यही विचार—विमर्श कालान्तर में लिपिबद्ध हो गये हों। रिक्थसम्बन्धी ( हिस्सेदारी अथवा विल) वार्त्ता की ओर यास्क ने जिस प्रकार संकेत किया है, इससे यही सिद्ध होता है कि उन्होंने कुछ ग्रन्थेां की ओर निर्देश किया है, जिनमें वैदिक वचनो के उद्धरण दिये गये थे—

अथैता जाम्या रिक्थप्रतिषेध उदाहरन्ति ज्येष्ठ पुत्रिकाया इत्येके। एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि रिक्थ के विषय में यास्क ने एक पद्य का उद्धरण दिया है, जिसे वे ऋचा न कहकर श्लोक कहते हैं—तदेतदृक्थलोकाभ्यामभ्युक्तम्। अंगादंगात्सम्भवति..... स जीव: शरद: शतम्। अविशेषेण पुत्राणं दायो भवति धर्मत:। मिथुनानां विसर्गादौ मनु: स्वायम्भुऽवोब्रवीत्। निरुक्त 3.4.5.

इससे स्पष्ट हो जाता है कि धर्म—सम्बन्धी ग्रन्थ श्लोक—छन्द में या श्लोकों में प्रणीत थे। यदि धर्म—सम्बन्धी ग्रन्थ यास्क के पूर्व विद्यमान थे, तो धर्मशास्त्रीय ग्रन्थेां की तिथि विक्रम से कई शताब्दियाँ पूर्व की मानी जायेगी।  इस विषय में अन्य प्रमाण भी हैं, यथा गौतम, बौधायन तथा  आपस्तम्ब के धर्मसूत्र जिनमें धर्मशास्त्रों की पुराण व इतिहास के रूप में चर्चा की गई है।

गौतमधर्मसूत्र:— तस्य च व्यवहारो वेदो धर्मशास्त्राण्यंगानि उपवेदा: पुराणम्। गौतम धर्मसूत्र 9.21

इस सूत्र  में आचार्य गौतम ने पुराणों को उपवेद भी कहा है। तथा उन्हें धर्मशास्त्र भी कहा गया है। अत: सूत्र ग्रन्थ यानि कल्प नामक वेदांग में पुराणों को प्रमाण रूप स्वीकार किया गया है।  पुन: बौधायन ऋषि लिखते हैं:— धर्मशास्त्ररथारूढ़ा वेदखड्गधरा द्विजा:। क्रीड़ार्थमपि यद्ब्रूयु: स धर्म: परम: स्मृता:। बौधायनधर्मसूत्र 1.13) अर्थात् धर्मशास्त्र रूपी रथ पर आरूढ होकर वेद रूपी तलवार धारण करने वाले द्विज जो भी कुछ आचरण आदि के सन्दर्भ में कहें। वह सब धर्म ही है। यहाँ बौधायन ने धर्मशास्त्र व वेद से युक्त होना ही द्विज की योग्यता बताई तथा ऐसे व्यक्ति के वाक्यों को ही धर्म कहा। इस प्रकार धर्मसूत्र के धर्मशास्त्रों के होने का प्रमाण प्राप्त होता है। बौधायन ने धर्म की व्याख्या करते हुये स्मार्तो द्वितीय ऐसा कहा है जिसका स्पष्ट अर्थ है कि वेद धर्म का प्रथम उपादान है, तथा स्मार्त्त धर्म द्वितीय है, अत: यह भी पुष्ट प्रमाण है कि सूत्रग्रन्थों के रचना के समय स्मृतिग्रन्थ उपलब्ध थे अथवा धर्मशास्त्र को स्मृति के नाम से कहा जाता था। परन्तु दोनों ही स्थितियाँ धर्मशास्त्रों के सूत्र ग्रन्थो के साथ—साथ होने को प्रमाणित करती है—पूर्वमीमांसा (6.7.6)—शूद्रश्च धर्मशास्त्रत्वात्तत्र। यहाँ भी आश्रम सम्बन्धी नियमों के लिये धर्मशास्त्रों को प्रमाण माना है। यह प्रमाण पूर्वमीमांसा सूत्रकार जैमिनी दे रहे हैं। ​इसका तात्पर्य है कि दर्शन सूत्रों की स्थापना के समय स्मृतियाँ व पुराण वर्तमान थे एवं दार्शनिकों ने वेद की ही भाँति इन्हें भी प्रमाण माना। आपस्तम्ब कहते हैं—पुन: सर्गे बीजार्था भवन्तीति भविष्यत्पुराणे। आपस्तम्ब धर्मसूत्र 2.9.4.6)  आपस्तम्ब धर्मसूत्र में तो आपस्तम्ब ने स्पष्ट रूप से न केवल पुराणों का उल्लेख किया है अपितु पुराण का नामोल्लेख तक कर दिया है। इस प्रकार पी.वी.काणे महोदय ने कई प्रमाण प्रस्तुत किये, उन्होंने उन मतों को नहीं माना, जिनमें यह सिद्धान्त प्रतिपादित करने का प्रयास किया गया कि सूत्र—ग्रन्थो के उपरान्त अनुष्टुप् छन्द वाले गन्थ प्रणीत हुये। इसके विपक्ष में प्रमाण देते हुये पी.वी.काएणे महोदय लिखते हैं कि उन दिनों के ग्रन्थों के विषय में हमारा ज्ञान इतना न्यून है कि इस प्रकार का सामान्यीकरण समीचीन नही है। श्लोक—छन्द वाला ग्रन्थ मनुस्मृति कुछ धर्मग्रन्थों से , जैसे विष्णुधर्मसूत्र से प्राचीन और वसिष्ठधर्मसूत्र का समकालीन है। कुछ प्राचीनतम धर्मसूत्रों में, यथा बौधायन लम्बे लम्बे प्रबन्ध श्लोक छन्द में पाये जाते हैं। एवं उनमे कुछ तो उद्धरण मात्र हैं। यहाँ तक कि आपस्तम्ब में भी बहुत से श्लोक प्राप्त होते हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि श्लोक—बद्ध ग्रन्थ धर्मसूत्रों से पूर्व भी विद्यमान थे। इनके अतिरिक्त तथा बौधायन के समय में धर्म—सम्बन्धी एक बृहत् साहित्य था जो वर्तमान में उपलब्ध नहीं है। (धर्मशास्त्र का इतिहास भाग—1, पी.वी.काणे, पृ.11)

यहाँ बताना आवश्यक है कि जिन सूत्र ग्रन्थों का ऊपर प्रमाण दिया गया है वे सूत्र ग्रन्थ छ वेदांगों में से कल्प नामक वेदांग के अंग हैं अत: जब स्मृतियों व पुराणों का वेदांगों में उल्लेख प्राप्त होता है, तो वह नवीन कृति कैसे हो सकती है। दूसरा वह प्रमाण क्यों नहीं? उसमें झूठ व पाखण्ड कैसे आ गया? आदि आदि प्रश्न उनके लिये हैं जो कुतर्कों के आधार पर पुराणों को मिथ्या प्रवंचना कहते आये हैंं। मेरी इन आलेखों की शृँखला का एक उद्देश्य ''झूठार्थतम भंजनम्'' भी है। अर्थात् पुराणों को अपमानित करने के लिये वैदेशिकों से धन प्राप्त कर जो पुराण विरोधी, सनातन धर्म परम्परा विरोधी ग्रन्थ लिखे गये। उनके कुतर्को का तर्कपूर्णविधि से व सप्रमाण विच्छेद किया जाय।

कल एक पाठक ने प्रश्न किया था कि पुराण किसे कहा है तो उसकी परिभाषा इस प्रकार है— निरुक्तकार यास्काचार्य ने पुराण शब्द को समझााते हुये लिखा है—पुरा नवम् इसी प्रकार मालविकाग्निमित्रम् में पुराण शब्द को निर्वचित करते हुये कहा है पुराणामित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम् ।। मालविकाग्निमित्रम् 1.2।। रघुवंशम में कालिदास ​ने लिखा है पुराणपत्रापगामादनंतरम्।। 3.7।।  श्रीमद्भगवत् गीता में भी पुराण शब्द को समझाया गया है—'' वयोवृद्ध, पुरातनख् अजो नित्य: शाश्वतो5यं पुराण:।।2.20।। इस प्रकार पुराण शब्द विभिन्न अर्थों में प्रकट हुआ हैं किन्तु पुराण शब्द का धर्मशास्त्रीय रूप में अर्थ मत्स्य पुराण में लिखा है—

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि। 

वंशानुचरितंचैव पुराणं पंचलक्षणम्।। 

जिन ग्रन्थेा में सर्ग अर्थात् सृष्टि उत्पत्ति , प्रतिसर्ग यानि सृष्टि का लय होना, वंश ,मन्वनतर और वंशचरित इन पाँचो का उल्लेख प्रापत होता है। वही पुराण हैं। इसीलिये याज्ञवल्क्य स्मृति के श्लोक पर वीरमित्रोदयकार ने टीका करते हुये लिखा''पुराणं ब्राह्मादि वक्ष्यमाएा''।

मेरे इन आलेखों से कई झूठार्थतमानुयायियों की स्थिति विकट हुई है। एवं वे तर्क करने, मेरे आलेखों का प्रत्युत्तर देने की अपेक्षा मेरे ऊपर व पुराणों पर अनर्गल टिप्पणियाँ कर रहे हैं। मेरा यह मानना है कि इस महान् भारत की भारती सन्तति है उसमें निराकार व साकार उपासक साथ साथ रहते आये हैं। साकार उपासकों को कभी निराकार उपासकों से न तो वैर रहा है। न ही रहेगा। किन्तु निराकार उपासकों की स्थिति अत्यन्त वैषम्यपूर्ण, द्वेष, ईर्ष्या युक्त है। एवं उनको पुराणो व मूर्त्ति पूजा से वैर है इसके विरोध हेतु विवेकान्ध वे किसी निम्नस्तर तक पहुँच सकते हैं। अपित पहुँच रहे हैं। वर्तमान में महान् भारत को उसकी प्राचीन सनातन परम्परा व संस्कृति ही अपना गौरवपूर्ण शिखर तक पहुँचा सकती है। अत: जो कोई भी निराकार उपासक अनावश्यक रूप से साकार उपासना व मू​र्त्ति पूजा का विरोध करता है। वह निश्चित ही राष्ट्रद्रोही  व धर्मद्रोही है।


डॉ.दिलीप कुमार नाथाणी विद्यावाचस्पति

सोमवार, 14 दिसंबर 2020

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—3


 

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—3

वल्लभाचार्य ने पुराणों की प्रासंगिकता व औचित्य पर प्रकाश डालते हुये कहा है कि—

यन्न दृष्टं हि वेदेषु तं दृष्टं स्मृतिभि: किल। 

उभाभ्यां यन्न दृष्टं हि तत्पुराणेषु गीयते।

अर्थात् जो हमें वेदों में दिखाई नहीं देता वह स्मृतियों से समझा जा सकता है एवं जो स्मृतियों ने नहीं दिखाई देता वह पुराणों में वर्णित है। इस श्लोक का तात्पर्य है कि वेदों में सारा ज्ञान सूत्रात्मक रूप से वर्णित है। ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति उसको समझने में सक्षम नहीं हेाता है तो उस ज्ञान को उन्हीं ऋषियों ने सरल रूप से स्मृतियों में प्रस्तुत किया गया है। जब कोई साधारण मति मनुष्य जो कि वेद के ज्ञान को समझना चाहता है किन्त उतना श्रम व तपस्या नहीं कर सकता तो उसके लिये ऋषियों के द्वारा पुराणों की रचना की गई। इस प्रकार यह पुराणों का महत्त्व, प्रासंगिकता व औचित्य सभी को प्रकट करता है। अब मैं पुराणों के सम्बन्ध में प्राचीन ग्रन्थों में क्या कहा गया है उसके प्रमाण दूँगा। क्योंकि जिन्होंने सत्यार्थ प्रकाश पढ़ा उन्होंने पुराणों के सन्दर्भ में मात्र वही तथ्य पढ़ें जिन्हें लेखक ने लिखा। किसी भी विषय के सन्दर्भ में पक्ष व विपक्ष दोनों को पढ़े बिना निर्णय करना असम्भव व अनुचित है। पुराण विषयक जो विपक्ष है उसे सत्यार्थ प्रकाश में दिया गया है। इसके विपरीत  न्यून से न्यून 2500 वर्षों से जो पुराण प्रत्यक्ष हैं उसके लिये बिना विचारे मात्र एक लेखक के द्वारा प्रस्तुत चन्द पंक्तियों के आधार पर उस परम्परा का त्याग करना कथ​मपि उचित नहीं है। अत: मैं यहाँ पुराणो के पक्ष की स्थापना करना चाहता हूँ। पुराणों के सन्दर्भ में प्राचीन ग्रन्थेां मे जो प्रमाण दिये गये वे निम्न प्रकार हैं।

1.मत्स्य पुराण मे कहा है कि वेद के ज्ञान को सरलता से समझने के लिये ही धर्मशास्त्रो व पुराणेां की रचना की गई—

अंगानि चतुरो वेदा: पुराणन्याविस्तरा:। 
मीमांसा धर्मशास्त्राणि परिगृह्यात्मसात्कृतम्।

वेद के छ: अंगों के साथ ही उसके समझे जाने के प्रसंग से चार अंगों की भी स्थापना की गई है। वे हैं पुराण, न्याय दर्शन, मीमांसा व धर्मशास्त्र (स्मृतियाँ)।

2. पाणिनी अष्टाध्यायी के चतुर्थ अध्याय के तृतीय पाद का 105 वाँ श्लोक है '' पुराणप्रोक्तेषु ब्राह्मणकल्पेषु'' इस सूत्र का अर्थ है पुराणों, ब्राह्मण व कल्पों में यहाँ ये तीनों ही ग्रन्थ हैं। वैसे कई सनातन पुराण परम्परा विरोधियों ने अपनी पुस्तकों में इस सूत्र के पुराण शब्द का अर्थ भी ब्राह्मण ग्रन्थ ही किया है। किन्तु पाणिनि जैसे व्याकरणाचार्य जहाँ एक मात्रा तक की  त्रुटि नहीं कर सकते वे एक ही ग्रन्थ को प्रस्तुत करते हुये पर्यायवाची शब्द का प्रयोग करते हुये दो बार एक ही ग्रन्थ का उल्लेख क्यों करेंगे।

3.याज्ञवल्क्य शिक्षा के प्रकार को समझाते हुये अपने स्मृति ग्रन्थ याज्ञवल्क्य स्मृति में लिखते हैं कि पुराण 14 प्रकार की शिक्षाओं में से एक अंग है—

पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्रांगमिश्रिता:। 
वेदा: स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतु​र्दश। 

(याज्ञवल्क्य स्मृति, वीरमित्रोदय परिभाषा प्रकाश, भाग—1पृ11

अर्थात् पुराण, न्याय, ​मीमांसा, धर्मशास्त्र, छ: वेदांग व चार वेद ये कुल 14 विद्या व धर्म प्राप्ति के साधन हैं। इसी श्लोक की प्राप्ति विष्णुपुराण में भी होती है। विष्णु पुराण ने छ: वेदांगों के साथ चार उपवेदों केा जोेड़कर विद्या व धर्म के 18 स्थल अथवा साधन बताए हैं—

अंगानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्याविस्तर:। 
धर्मशास्त्रं पुराणं च विद्या ह्येताचतुर्द्दश:।।
आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वश्चेति ते त्रय:।
अर्थशास्त्र चतुर्थ तु विद्या ह्यष्टदशैव ता:।। 

विष्णु पुराणम्

अर्थात् चारवेद, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र (स्मृतियाँ), पुराण, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद, अर्थशास्त्र इस प्रकार विद्या के कुल अट्ठारह प्रकार कहे गये हैं। वीरमित्रोदय कार मित्रमिश्र ने विष्णु पुराण के इस श्लोक पर टीका करते हुये कहा है कि इसमें प्रथम चौदह प्रकार तो विद्या व धर्म दोनेां की प्राप्ति करात हैं। एवं शेष चार अर्थ को समझाते हैं, तथापि ये धर्म के अनुषांगिक हैं।

4. अब अन्त में पण्डित भगवद्दत्त जो कि आर्यसमाजी हैं एवंं वैदिक वाङ्मय का इतिहास के प्रथम खण्ड में प्रमाण देते हुये न्याय सूत्र 4.6.62 पर भाष्य करते हुये एक ब्राह्मण ग्रन्थ का प्रमाण देकर वात्स्यायन मुनि लिखते हैं— य एवं मन्त्रब्राह्मणस्य द्रष्टार: प्रवक्तारश्च ते खल्वितिहासपुराणस्य धर्मशास्त्रस्य चेति। अर्थात् जो मन्त्र द्रष्टा ​ऋषि थे वे ही इतिहास यानि रामायण महाभारत पुराण व धर्मशास्त्र यानि स्मृतियों के रचनाकार हैं। पण्डित भगवद्दत्त न्यायभाष्य का एक अन्य उदाहरण देते हुये लिखते हैं— य एवाप्ता वेदार्थाना द्रष्टार: प्रवक्तारश्च त एवायुर्वेदप्रभृतीनामिति। अर्थात् जो वेदार्थ द्रष्टा तथा प्रवक्ता हैं वे ही आयुर्वेद आदि के भी हैं। इन दोनों वचनों से यही तात्पर्य स्पष्ट होता है कि आप्त यानि साक्षात्कृतधर्मा लोग वेदार्थ के द्रष्टा भी थें वह वेदार्थ उन्होंने धर्मशास्त्रों में प्रकट किया। इसीलिये वे ऋषि ही महर्षि कहलाये। पण्डित भगवद्दत्त ने गौतम बुद्ध का वाक्य इस सम्बन्ध में प्रमाण रूप में प्रस्तुत किया है  जोकि इस प्रकार है— वेद और ऋषियों के विषय में तथागत बुद्ध की सम्पत्ति के विषय में शान्तरक्षित अपने तत्तवसंग्रह में लिखता है—यथोक्तं भगवात—इत्येते आनन्द पौराणा महर्षयो वेदानां कर्त्तारो मन्त्राणां प्रवर्तयितार:। ( वैदिक वाङ्मय का इतिहास—1, पृ—14) अर्थात् बुद्ध ने कहा— हे आनन्द! ये पुराणो के रचयिता महर्षि थे, जिन्होंने पूर्व में वेद बनाए, और मन्त्रों को प्रवृत्त किया। इसमें वेदकर्त्ता  से तात्पर्य वेद की शाखा का प्रवर्तन है।

5. युधिष्ठिर मीमांसक— ये भी परम आर्यसमाजी हैं इन्होंने व्याकरण शास्त्र का इतिहास नामक ग्रन्थ लिखा है उसमें इन्होंने शतश: प्रमाण पुराणों के आधार पर प्रस्तुत​ किये हैं। आचार्य वात्स्यायन के प्राचीन ऐतिह्य—सिद्ध सिद्धान्त की पुष्टि में न्यायभाष्य से पूर्वकालिक  प्रमाण प्रस्तुत करते हुये लिखते हैं कि जैमिनि शाखा व उसके ब्राह्मण ग्रन्थ के प्रवक्ता भारतयुद्धकालीन महामुनि जैमिनि ने पूर्वमीमांसा के कल्पसूत्र—प्रामाण्याधिकरण में लिखा है कि— अपि वा कर्तृसामान्यात् तत् प्रमाणमनुमानंस्यात्। (पूर्व मीमांसा कल्पसूत्र प्रमाण्याधिकरण 1.3.2) अर्थात् कल्पसूत्रों की जिनका मूल आम्नाय में नहीं मिलता, वे अप्रमाण नहीं हैं। आम्नाय और कल्पसूत्रों के कर्त्ता प्रवक्ता समान होने से, आम्नाय में अनुक्त कल्पसूत्र की विधियों का भी प्रामाण्य है। अर्थात् जिन ऋषियों ने आम्नाय यानि वेद की शाखाओं और ब्राह्मण ग्रन्थों का प्रवचन किया, उन्होंने ही कल्पसूत्रों की भी रचना की, अत: यदि उनका वचन ग्रन्थ में प्रमाण है, तो दूसरे में स्वयंसिद्ध प्रमाण है।

आज मैंने  वे प्रमाण दिये हैं जो आधुनिक युग के लोगों ने पुराणों की प्रामाणिकता के सन्दर्भ में प्रस्तुत किये हैं। ये सभी भारतीय विचारकों के हैं। किन्तु भारतीय धर्मदर्शन व पुराणों के परिप्रेक्ष्य मे जो वैदेशिकों ने सत्यार्थ कार्य किया है वह मैं आगे प्रस्तुत करूँगा।

                                 

डॉ.दिलीप कुमार नाथाणी विद्या वाचस्पति

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—2

 

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा
मण्डनम् व पुराण स्थापना—2

यदि किसी थान आदि की चर्चा की जाय तो वहाँ कोई भी आपसे मद्य आदि की माँग करे तो वह अनुचित है। ये तथ्य सही है। एवं ऐसा करने वाले कुछ दुष्ट प्रकृति के लोग रहे भी होंगे। किन्तु वर्तमान में दैवी व भैरव आदि के कई स्थलों पर ऐसी किसी वस्तु को प्रसाद के रूप में चढ़ाने वहाँ बाँटने आदि के लिये स्पष्ट मना किया जाता है। तथापि सारे तथ्य उन लोगों के सन्दर्भ में दिये जा रहे हैं जो मूर्त्ति पूजा के नाम पर पाखण्ड करते हैं। एवं  ऐसे जितने भी लेखक महोदय हैं उन्होंनेउन्हीं पाखण्डों को अनुचित ठहराया है। किन्तु उनके अनुयायियों ने ग्रन्थ में वर्णित पाखण्डी लोगों की तरह सभी प्रकार की मूर्त्ति पूजा व मूर्त्ति पूजकों को मान लिया, एवं उसके लिये कुतर्कों की पुस्तकें रच डाली उसका लाभ म्लेच्छों ने लिया और पहले तो मूर्त्ति पूजा का एवं उसके उपरान्त पूर्ण सनातन संस्कृति व परम्परा का विरेाध करने लग गये हैं।

यहाँ लेखक ने मूर्त्ति पूजा के आधार पर ढोंगी लोगों के कर्मों को समझाया है इन बन्धुओं ने उसे  मूर्त्ति पूजा के सम्पूर्ण क्रम को ही इन ढोंगियों के अनुसार ग्रहण कर लिया। मूर्त्ति पूजा  पूर्णत: एक विज्ञान है। इसी कारण मूर्त्तियाँ कैसी हों, किस पत्थर से बनी हों, किस देवता की मूर्त्ति किस पत्थर व किस किस आकार की हों। कुछ देवता यथा महादेव, विष्णु आदि के स्थायी निवास जिन जिन नदियों अथवा भू—प्रदेशों में  होने से उन उन नदियों के पत्थर तत्समबन्धी देवताओं के  विग्रह ही हैं। उनकी स्थापना आदि की आवश्यकता नहीं होती। विभिन्न देवी—देवताओं की मूर्त्तियों के अंग यथा हाथ हाथों की मुद्राएँ आदि कैसी हों उनके नेत्र व मुख किस दिशा में हों। उनके कौन कौन से अस्त्र किस हाथ में हों इस प्रकार की प्रत्येक दशा का विभिन्न परिणाम आदि  का वर्णन हमें  कई ग्रन्थों में प्राप्त होता है। जिनमें गरुड़ पुराण, अग्नि पुराण में सर्वाधिक है। इसके अलावा विभिन्न ग्रन्थ जिनमें वास्तु से सम्बन्धित ग्रन्थों में मूर्त्तियों की स्थापना व स्वरूप लक्षण उनके परिणाम आदि पर विस्तृत चर्चा प्राप्त होती है।  मूर्त्ति पूजा इतनी ही मिथ्या होती एवं व्यर्थ होती तो उस पर इतनी अधिक चर्चा क्यों होती। एक ग्रन्थ को पढ़कर सहस्र वर्षों के ज्ञान को तिलांजलि देना भी तो अन्ध श्रद्धा ही है। अपितु महामूर्खता है।

वेद पर सायण, महीधर, श्रीस्वामी, आदि कई विद्वानों ने अपने भाष्य लिखे एवं समझाया है परन्तु इनमें से किसी ने मूर्ति पूजा का विरोध नहीं किया। परन्तु एक अंकल जी तो सायण आदि दिव्य व्यक्तित्वों को ही अभद्र शब्दों से ताड़ना करता है। मुझे तो ये अंकल जी वास्तव में अंकल यानि अन अकल ही दीखते हैं।

सहस्रों वर्षों से देवलायों एवं उनमें देवविग्रहों की स्थापना होती आई है। कई सहस्राब्दियाँ प्राचीन मन्दिरों के भग्नावशेष हमें प्राप्त होते हैं। यहाँ तक पाणिनी अष्टाध्यायी में भी इस प्रकार के कई सूत्र प्राप्त होते हैं।  यही नहीं पिछली कुछ शताब्दियों से जब से यूरोप वासी भारत में आये तो उन्होंने यहाँ कि मूर्त्तियाँ चोरी करके  यूरोप व अन्य पश्चिमी देशों में मूँहमाँगे दामेां पर बेची हैं। वहाँ लाल बन्दर जैसे मुँह वाले गोरे उन्हें बड़े ही मान सम्मान के साथ अपने घरों में स्थापित कर रहे हैं। उनको उसका सकारात्मक लौकिक व आध्यात्मिक लाभ भी मिल रहा है। पर नहीं हमारे एक व्यक्ति के मन मे आ गया कि साकार उपासना नहीं करनी तो अब हम प्रयासरत रहेंगे कि मूर्त्ति पूजा का विरोध करेंगे। चाहे कितने कुतर्क देन पड़ें। कितने ही सत्यों को असत्य कहना पड़े।

ये म्लेच्छों के समय में ही मूर्त्ति पूजा समाप्त करने का एक षडयन्त्र था इसके लिये उन्होंने विभिन्न समाजों, संगठनों, परिषद्, सोसा​यटियों की स्थापना करके उसके द्वारा मूर्ति पूजा का विरोध करने का प्रयास किया था। किन्तु वह षडयन्त्र असफल रहा। बंगाल में बंकिमचन्द्र चटोपाध्याय, शरतदचन्द्र आदि ने अपने साहित्य मे इनके मत का खण्डन किया एवं  ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जैसे समाज सुधारकों ने सामाजिक जन जागृति के द्वारा वहीं इस ब्रह्म समाज की समाधि भी बना दी जहाँ इसकी स्थापना हुई थी।  लगभग आधी शताब्दी उपरान्त एक महोदय ने वेद के आधार पर मूर्त्ति पूजा का विरेाध प्रारम्भ किया। उसका प्रभाव पड़ा तो अँग्रेजों को भारतीय संस्कृति को समाप्त करने का ये उत्तम अवसर दिखा एंव उन्होंने  किसी भी एक समाज विशेष पर पर कभी भी प्रतिबन्ध नहीं लगाया। यद्यपि अँग्रेजों ने भारतीय शिक्षा पद्धति यहाँ के गुरूकुल, उद्योग धन्धे सभी को समाप्त करने के लिये विभिन्न विधिनियिम बनाये किन्तु अँग्रेजों  संस्था के विरूद्ध कोई कठोर व अनुशासनात्मक कार्यवाही नहीं की थी। जिन जिन  समाजियों ने अँग्रेज सरकार के विरोध में भारतीय स्वतन्त्रता हेतु जो सत्कार्य किया उनके विरूद्ध व्यक्तिश: स्तर पर कार्यवाही हुई। किन्तु उसका प्रभाव संस्था पर नहीं हुआ। 

इसका सर्वाधिक प्रभाव साधुओं के संगठनों पर पड़ा एवं उनपर भयंकर अत्याचार हुये। वे सभी सन्यासि मूर्त्तिपूजक थे। अँग्रेजों ने भयंकर तरीके से इन सनातनी सन्यासियों पर अत्याचार किये। एवं इतिहास में से उनका नाम मिटा दिया। अँग्रेज म्लेच्छों का कार्य एक स्तर पर नहीं होता था उसके कई कई स्तर होते थे। उनके मस्तिष्क में राजस्थापना के साथ ही यहाँ की मूल संस्कृति व परम्परा व धर्म को समाप्त करना भी था। वे मूर्त्ति पूजा के सभी सम्भावित प्रमाणों को नष्ट करना चाहते थे।

इसी क्रम मे जिन  सनातनी परम्परा व मूर्त्ति पूजक संस्थाओं से सम्बन्धित लोगों ने स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लिया तो उनको पूरी तरह से संस्था सहित समाप्त करने का प्रयास किया गया। जिसमें हिन्दू महासभा, एवं उनके अनुषांगिक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख थे। अँग्रेज म्लेच्छों ने इनके कार्यकर्त्ताओं के साथ इन संगठनों को भी हानि पहुँचाई। हिन्दू महासभा को तो भारत की स्वतन्त्रता के उपरान्त भी प्रतिबन्धित किया गया।

इसका सर्वश्रेष्ठ प्रमाण है समाज सुधारकों के आधुनिक इतिहास में राजाराम मोहन राय, , ऐनी बिसेण्ट थियोसोफिकल सोसाइटी ब्रह्मसमाज को तो पढ़ाया जाता है। किन्तु सावरकर, ईश्वर चन्द विद्यासागर, वेद समाज, हिन्दू महासभा, राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ आदि को नहीं पढ़ाया जाता है।

ये तथ्य स्पष्ट करता हैं कि मूर्त्ति पूजा भारतीय संस्कृति व परम्परा का प्राण है, जब तक ये परम्परा चलती रहेगी भारत स्थायी रूप से विश्व के मानचित्र पर दृष्टिगोचर होता रहेगा। जिस दिन मूर्त्ति पूजा समाप्त कर दी गई उसी दिन भारत भी समाप्त हो जायेगा।

अत: जो भी बिना विचारे मूर्त्ति पूजा रूपी प्राचीन ऋषियो की परम्परा का त्याग कल के एक साधारण वेद पाठी छोरे के कहने से करते हैं वे निश्चित ही किसी भ्रम में हैं। एवं ये निश्चित रूप से भारत की जड़ों को खोखला करने वाला कुत्सित कार्य में संलग्न हैं। मेरा उन सभी बन्धुओं से करबद्ध प्रार्थना है कि वे यदि निराकार उपासना करना चाहते हैं तो करें ये उपासना पद्धति भी हमारे पुराण आदि धर्मशास्त्रों में वर्णित है। किन्तु साकार उपासना की बुराई एवं उसे समाप्त करने का प्रयास नहीं करें।


डॉ.दिलीप कुमार नाथाणी विद्या वाचस्पति