सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—8
वेद कहने मात्र से वेदार्थ का ज्ञान नहीं हो सकता। इसके लिये आवश्यक है गुरु—शिष्य परम्परा से उसका अध्ययन किया जाय। वर्तमान में गुरुकुल नहीं होने से वेद का अध्ययन करना सहज नहीं है। अत: वेदों के आधुनिक युग के प्रथम भाष्य के रूप में पुराणों का अध्ययन किया जा सकता है। पुराणों में ही वेद के अर्थ को प्रकट किया गया है। भगवान् के ज्ञानावतार श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यास जी ने पुराणों में वेद के अर्थ को ही प्रकट किया। अथवा जिसे कहा जाय कि पुराण विद्या वह विद्या है जिसके माध्यम से वेदों के अर्थ को सरलतया समझा जा सकता है।
वेद नाम पर पाखण्ड करने वाले का कुतर्क:—
सत्य सनातन सिद्धान्ती द्वारा कुतर्कोपशमनम्:—
इस प्रकार के मिथ्या आरोपों के लिये दु:खवश मन में यही शब्द आते हैं— अब्रह्मण्यम्! अब्रह्मण्यम्! अब्रह्मण्यम्!
वेद के नाम पर पाखण्ड फैलाने वाले सत्य सनातन आर्य धर्म विरोधी महोदय ये भूल गये कि पूर्व में ये महोदय हिन्दूओं के किसी अन्य वर्ण को नीच बता आये अब किसी अन्य वर्ण को छद्मकारी बताते हैं। अब बतायें कि इन जैसे महानुभव को हिन्दू एवं सत्य सनातन संस्कृति विरोधी नहीं कहा जाय तो क्या कहा जाय? खैर ये पाठक की स्वेच्छा पर निर्भर है।
हमारा उद्देश्य तो झूठार्थ तम भंजन करना है। तो अब ज्येातिष पर चर्चा करें तो ज्योतिष के तीन प्रधान स्कन्ध बताये गये हैं, गणित, फलित, एवं प्रश्न या होरा इनमें से गणित पर ही फलित एवं प्रश्न ज्योतिष आधारित है। वैसे मेने यहाँ ज्योतिष सम्बन्धित अत्यन्त सूक्ष्म परिचय दिया है। सम्भवत: ज्येातिष के विद्वान् इस पर अधिक प्रकाश डाल सकते हैं। पर कुतर्की स्वयं कह रहा है कि अंक, बीज, रेखागणित सही है फलित मिथ्या है। यह कैसे हो सकता है? जब फलित, गणित आदि प्रायोगिक सिद्धान्तों पर आधारित है तो वह लीला कैसे हो सकती है? अथवा झूठी कैसे हो सकती है? यहाँ महाभारत का एक प्रसंग बताना आवश्यक है। शिव पार्वती संवाद के रूप में—
पार्वती:— प्रभु ये मानव विभिन्न प्रकार के कष्ट प्राप्त करने से बचने के लिये विभिन्न ग्रहों की उपासना क्यों करते हैं? क्या जन्मपत्री में स्थित ग्रहों की उपासना से उनका कल्याण होगा?
शिव:— देवी जन्मपत्रिका में स्थित ग्रह मानव के इस जन्म में होने वाली उन घटनाओं का विवरण प्रस्तुत करते हैं, जो मानव ने अपने पूर्वजन्म के कर्मों के आधार पर भागय रूप में प्राप्त की हैं। अथवा पूर्व जन्म के कर्मानुसार उन्हें क्या फल मिलने वाला है उसकी जानकारी जन्मपत्रिका के ग्रहों से हमें ज्ञात होती है।
इस संवाद से ये स्पष्ट हो जाता है कि जन्मपत्रिका जो कि गणितीय कलनाओं के आधार पर बनाई जाती है। उसमें स्थित ग्रह मनुष्य के पूर्वकर्मानुसार प्राप्त होने वाले फलों को दर्शाते हैं।
इस सन्दर्भ में एक अन्य तर्क है कि ज्येातिष छ: वेदांगों में से एक अंग है। एवं इसकी उत्पत्ति का कारण बताते हुये ऋषि कहते हैं कि यज्ञोंं के शुभ समय को ज्ञात करने के लिये ही ज्योतिष की उत्पत्ति हुई इसीलिये इसे चक्षु भी कहा है।
वेद के नाम पर पाखण्ड करने वाले महोदय एक स्थान पर तो स्वयं ही वेदांग को आवश्यक शिक्षा मानते हैं। वही स्वयं ही ज्योतिष को आधा सही आधा असत्य बता रहे हैं। अब पाठक स्वयं निर्धारित करें कि वे किस पक्ष को उचित मानेंगे।
जन्म पत्रिका देखने वाले बहुधा शोकिया तोर पर देखते हैं। एवं उनके उपचार विभिन्न प्रकार के वैदिक मन्त्रों का जप करने के विधान बताये जाते हैं। एवं यज्ञों का विधान बताया जाता है। किन्तु जिनके लिये वेद, पुराण, रामायण, महाभारत, वेदांग, दर्शन आदि से बढकर उनके सम्प्रदाय की एक पुस्तक श्रेष्ठ है तो उनके लिये सारे तर्क ही व्यर्थ हैं।
ज्योतिष पर पराशर ऋषि, समुद्र ऋषि, आदि अनगिनत ऋषियों ने अत्यन्त सूक्ष्म विवेचना प्रस्तुत की है। उन ग्रन्थेां को न तो सम्प्रदाय के अधिष्ठाता महोदय ने पढ़ा एवं न ही उनके अन्धानुगामियों ने पढ़ा तो उसका क्या उपचार हो सकता है? ये पाठक स्वयं निर्धारित करें।
जाका गुरू भी आंधला शिष्य खड़ा निरन्ध।
आंधा आंधे ठेलिया कूप मह पणंत।
सत्य सनातन आर्य वैदिक परम्परा में मूर्त्ति पूजा एक साधन माना गया है। वेदों में विभिन्न स्थानों पर सारी दैविक शक्तियों के स्वरूप वर्णन के असंख्य श्लोक हमें प्राप्त होते हैं। बृहस्पति, अग्नि, वरूण, इन्द्र, अश्विनीकुमार आदि विभिन्न देवताओं के स्वरूपों का वर्णन हमें वेदों में सरलतया प्राप्त होता है। अब एक महोदय खड़े हुये उन्होंने वेदों को तो व्याकरण आदि के आधार पर पढ़ लिया एवं उन वेदों के व्याख्या ग्रन्थ पुराणों आदि का पढ़ा नहीं और प्रारम्भ हुये ईश्वर के अवतार की आलोचना करने। जैसे जैसे ये मूर्त्ति पूजा मण्डनम् एवं पुराण स्थापना के अन्तर्गत हम झूठार्थ तम भंजनम् कर रहे हैं। वैसे वैसे मूर्त्ति पूजा विरोधियों में अधैर्य, बैचेनी एवं अन्य मानसिक रोग उठने प्रारम्भ हो रहे हैं।
डॉ. दिलीप कुमार नाथाणी विद्यावाचस्पति





