शुक्रवार, 9 दिसंबर 2022

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—8


सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—8


 वेद कहने मात्र से वेदार्थ का ज्ञान नहीं हो सकता। इसके लिये आवश्यक है गुरु—शिष्य परम्परा से उसका अध्ययन किया जाय। वर्तमान में गुरुकुल नहीं होने से वेद का अध्ययन करना सहज नहीं है। अत: वेदों के आधुनिक युग के प्रथम भाष्य के रूप में पुराणों का अध्ययन किया जा सकता है। पुराणों में ही वेद के अर्थ को प्रकट किया गया है। भगवान् के ज्ञानावतार श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यास जी ने पुराणों में वेद के अर्थ को ही प्रकट किया। अथवा जिसे कहा जाय कि पुराण विद्या वह विद्या है जिसके माध्यम से वेदों के अर्थ को सरलतया समझा जा सकता है। 

वेद नाम पर पाखण्ड करने वाले का कुतर्क:—  

ज्योतिशास्त्र में अंक, बीज, रेखागणित विद्या है, वह सब सच्ची है जो फल (फलित) की लीला है, वह सब झूठी है। ऐसा कहते हुये अब ये वेद नाम का आवरण ओढ़े हुये पाखण्डी महोदय ब्राह्मणों की आलोचना करना प्रारम्भ करते हैं। एवं जन्मपत्रिका देख कर धनाढ्य लोगों के साथ छल करते हुये धन हरण करते थे।

सत्य सनातन सिद्धान्ती द्वारा कुतर्कोपशमनम्:—

  इस प्रकार के मिथ्या आरोपों के लिये दु:खवश मन में यही शब्द आते हैं— अब्रह्मण्यम्! अब्रह्मण्यम्! अब्रह्मण्यम्! 

वेद के नाम पर पाखण्ड फैलाने वाले सत्य सनातन आर्य धर्म विरोधी महोदय ये भूल गये कि पूर्व में ये महोदय हिन्दूओं के किसी अन्य वर्ण को नीच बता आये अब किसी अन्य वर्ण को छद्मकारी बताते हैं। अब बतायें कि इन जैसे महानुभव को हिन्दू एवं सत्य सनातन संस्कृति विरोधी नहीं कहा जाय तो क्या कहा जाय? खैर ये पाठक की स्वेच्छा पर निर्भर है।

 हमारा उद्देश्य तो झूठार्थ तम भंजन करना है। तो अब ज्येातिष पर चर्चा करें तो ज्योतिष के तीन प्रधान स्कन्ध बताये गये हैं, गणित, फलित, एवं प्रश्न या होरा इनमें से गणित पर ही फलित एवं प्रश्न ज्योतिष आधारित है। वैसे मेने यहाँ ज्योतिष सम्बन्धित अत्यन्त सूक्ष्म परिचय दिया है। सम्भवत: ज्येातिष के विद्वान् इस पर अधिक प्रकाश डाल सकते हैं। पर कुतर्की स्वयं कह रहा है कि अंक, बीज, रेखागणित सही है फलित मिथ्या है। यह कैसे हो सकता है? जब फलित, गणित आदि प्रायोगिक सिद्धान्तों पर आधारित है तो वह लीला कैसे हो सकती है? अथवा झूठी कैसे हो सकती है? यहाँ महाभारत का एक प्रसंग बताना आवश्यक है। शिव पार्वती संवाद के रूप में—

पार्वती:— प्रभु ये मानव विभिन्न प्रकार के कष्ट प्राप्त करने से बचने के लिये विभिन्न ग्रहों की उपासना क्यों करते हैं? क्या जन्मपत्री में स्थित ग्रहों की उपासना से उनका कल्याण होगा?

शिव:— देवी जन्मपत्रिका में स्थित ग्रह मानव के इस जन्म में होने वाली उन घटनाओं का विवरण प्रस्तुत करते हैं, जो मानव ने अपने पूर्वजन्म के कर्मों के आधार पर भागय रूप में प्राप्त  की हैं। अथवा पूर्व जन्म के कर्मानुसार उन्हें क्या फल मिलने वाला है उसकी जानकारी जन्मपत्रिका के ग्रहों से हमें ज्ञात होती है। 

इस संवाद से ये स्पष्ट हो जाता है कि जन्मपत्रिका जो कि गणितीय कलनाओं के आधार पर बनाई जाती है। उसमें स्थित ग्रह मनुष्य के पूर्वकर्मानुसार प्राप्त होने वाले फलों को दर्शाते हैं। 

इस सन्दर्भ में एक अन्य तर्क है कि ज्येातिष छ: वेदांगों में से एक अंग है। एवं इसकी उत्पत्ति का कारण बताते हुये ऋषि कहते हैं कि यज्ञोंं के शुभ समय को ज्ञात करने के लिये ही ज्योतिष की उत्पत्ति हुई इसीलिये इसे चक्षु भी कहा है। 

वेद के नाम पर पाखण्ड करने वाले महोदय एक स्थान पर तो स्वयं ही वेदांग को आवश्यक शिक्षा मानते हैं। वही स्वयं ही ज्योतिष को आधा सही आधा असत्य बता रहे हैं। अब पाठक स्वयं निर्धारित करें कि वे किस पक्ष को उचित मानेंगे। 

जन्म पत्रिका देखने वाले बहुधा शोकिया तोर पर देखते हैं। एवं उनके उपचार विभिन्न प्रकार के वैदिक मन्त्रों का जप करने के विधान बताये जाते हैं। एवं यज्ञों का विधान बताया जाता है। किन्तु जिनके लिये वेद, पुराण, रामायण, महाभारत, वेदांग, दर्शन आदि से बढकर उनके सम्प्रदाय की एक पुस्तक श्रेष्ठ है तो उनके लिये सारे तर्क ही व्यर्थ हैं। 

ज्योतिष पर पराशर ऋषि, समुद्र ऋषि, आदि अनगिनत ऋषियों ने अत्यन्त सूक्ष्म विवेचना प्रस्तुत की है। उन ग्रन्थेां को न तो सम्प्रदाय के अधिष्ठाता महोदय ने पढ़ा एवं न ही उनके अन्धानुगामियों ने पढ़ा तो उसका क्या उपचार हो सकता है? ये पाठक स्वयं निर्धारित करें।

जाका गुरू भी आंधला शिष्य खड़ा निरन्ध। 

आंधा आंधे ठेलिया कूप मह पणंत।

सत्य सनातन आर्य वैदिक परम्परा में मूर्त्ति पूजा एक साधन माना गया है। वेदों में विभिन्न स्थानों पर सारी दैविक शक्तियों के स्वरूप वर्णन के असंख्य श्लोक हमें प्राप्त होते हैं। बृहस्पति, अग्नि, वरूण, इन्द्र, अश्विनीकुमार आदि विभिन्न देवताओं के स्वरूपों का वर्णन हमें वेदों में सरलतया प्राप्त होता है। अब एक महोदय खड़े हुये उन्होंने वेदों को तो व्याकरण आदि के आधार पर पढ़ लिया एवं उन वेदों के व्याख्या ग्रन्थ पुराणों आदि का पढ़ा नहीं और प्रारम्भ हुये ईश्वर के अवतार की आलोचना करने। जैसे जैसे ये मूर्त्ति पूजा मण्डनम् एवं पुराण स्थापना के अन्तर्गत हम झूठार्थ तम भंजनम् कर रहे हैं। वैसे वैसे मूर्त्ति पूजा विरोधियों में अधैर्य, बैचेनी एवं अन्य मानसिक रोग उठने प्रारम्भ हो रहे हैं। 


डॉ. दिलीप कुमार नाथाणी विद्यावाचस्पति

 

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—7


 सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—7


कुछ वेद पाखण्डी जो कल पैदा हुये उन्होंने अपने अहंकार एवं अपने मत व सम्प्रदाय की स्थापना के लिये के लिये अँग्रेजों से प्राप्त धन व सहायता के आधार पत्रक छपवा कर बाँटे जिसमें  परम्परया लक्षाधिक वर्षों से प्रचलित ज्योतिष शास्त्र को एवं हनुमान्, भैरव तथा भगवती पराम्बा को झूठा सिद्ध करने का कुतर्क प्रस्तुत करते हुये कहा कि— 

वेद नाम पर पाखण्ड करने वाले का कुतर्क— ये सब मिथ्या है, एवं यदि किसी को भूत बाधा हो तो उपरोक्त में से किसी देव या देवी के सिद्ध साधक के पास जाकर उपचार करवाये तो वह साधक निम्न जाति का है एवं उसे पैसे, मदिरा एवं माँस देकर अपना धन नष्ट करते हैं एवं रोग बढ़ाते हैं। 

सत्य सनातन सिद्धान्ती:— सर्वप्रथम यहाँ ये लोग उच्च व निम्न जाति के भेद को उत्पन्न कर रहे हैं। एवं उसके लिये जो वे मदिरा, वस्त्र मिठाई, माँस आदि की माँग सम्बन्धी विचार प्रस्तुत कर रहे हैं तो निश्चित ही वे अपने मत को सिद्ध करने के लिये ऐसे ही किसी अपराधी के पास गये होंगे अथवा गये भी या नहीं वे ही जाने। परन्तु सत्य तो यह है कि हनुमान्, भगवती पराम्बा, भैरव आदि की उपासना करने वाले बहुतायात में दूध की बनी हुई वस्तुओं का प्रसाद रूप में प्रयोग करते हैं। एवं जिन—जिन स्थानों पर ऐसे साधक बैठे हैं चाहे सालासर बालाजी, अथवा अजमेर के निकट श्मशान भैरव वहाँ आपसे आपके कष्ट निवारणार्थ किसी से कोई पेैसे, वस्त्र, धन, मदिरा, माँस आदि नहीं लिये जाते। यही नहीं, वहाँ श्मशान भैरव का साधक कोई तथाकथित किसी निम्न अथवा उच्च वर्ण का  है अथवा नहीं परन्तु एक उद्योगपति अवश्य है। एवं वहाँ मानव मात्र के कल्याण के लिये साधना करते हुये कुछ समय बिताकर पुन: अपने व्यापार में व्यस्त हो जाते हैं। परन्तु किसी वेद के नाम पर पाखण्ड फैलाने वाले लोगों में सत्य को स्वीकारने व देखने की शक्ति नहीं होने से कोई वहाँ जाकर सत्य नहीं देखता। 

अब हम आते हैं कि ये देवी देवता क्या हैं? तो इसका समाधान करेंगे कि ये वास्तव में प्राणात्मक ऊर्जा का स्वरूप है। जिसे पण्डित मधुसूदन ओझा जी, पण्डित मोतीलाल शास्त्री जी ने इस ऊर्जा को व्यापकता के साथ वेद विज्ञान के आधार पर समझाया है। परन्तु अँग्रेजों द्वारा  हिन्दू समाज में  आपस में वैर उत्पन्न करके हानि पहुँचाने के लिये बने सम्प्रदाय के लोगों के मन में ये सत्य कदापि नहीं आ सकता। क्योंकि अँग्रेजों द्वारा प्रदत्त धन सहायता के लिये इन्हें निष्ठावान् बनना होगा। इसीलिये ये वेद नाम के आवरण को ओढ़ कर सत्य सनातन हिन्दू धर्म की बुराईयाँ ही करेंगे।

यहाँ इन मूर्खों को ये बताया जाय कि आयुर्वेद में शरीर की कई प्रकार की चिकित्साओं में से भूत चिकित्सा का भी वर्णन प्राप्त होता है। अन्य किसी प्रकार के असन्तुष्ट आत्मा के मोक्ष सम्बन्धी वर्णन भागवत् महापुराण में प्राप्त होता है। जहाँ ब्राह्मण द्वारा भागवत् पाठ एवं दान मात्र का उल्लेख है। एवं उसमें पुरूष सूक्त से यज्ञ का भी विधान बताया गया है। अब उसमें कहाँ वस्त्र, धन, मिष्टान्न, मदिरा, माँस आया। किन्तु इन कुतर्कियों के पास कदापि उत्तर नहीं है।

 अपितु ब्राह्मणों का भी विरोध करने लगे क्योंकि उनसे शास्त्रार्थ में हार जो गये। अपनी हार के सत्य को ये कभी उद्घाटित नहीं करते। भारत से बाहर के लोगों ने चाहे वे मुगल हों या ईसाई(अँग्रेज) उन्होंने ब्राह्मणों की हत्या की किन्तु उन्हें पोंगा पण्डित नहीं कहा उसका कारण स्पष्ट था कि उन्हें ज्ञात था कि जब तक ब्राह्मण हैं उनके तथाकथित धर्मों की स्थापना नहीं हो सकती।

सत्य सनातन भारतीय वैदिक संस्कृति ही हम हिन्दूओं की संस्कृति है। इसमें वेद, स्मृति व पुराण ही  प्रमाण के रूप में मान्य हैं। इनमें वेद सर्वोपरि है तदुपरान्त स्मृति तथा अन्त में वेदों के भाष्य रूप में जाने जाने वाले पुराण माने गये हैं।

 

डॉ. दिलीप कुमार नाथाणी विद्यावाचस्पति


शुक्रवार, 2 दिसंबर 2022

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—6



सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—6



कुछ वेद पाखण्डी जो कल पैदा हुये उन्होंने अपने अहंकार एवं अपने मत व सम्प्रदाय की स्थापना के लिये के लिये अँग्रेजों से प्राप्त धन व सहायता के आधार एक पुस्तक लिखी जिसमें 

उन्होंने छपवाया कि  परम्परया लक्षाधिक वर्षों से प्रचलित ज्योतिष शास्त्र को एवं हनुमान्, भैरव तथा भगवती पराम्बा को झूठा सिद्ध करने का कुतर्क प्रस्तुत करते हुये कहा कि— 


वेद नाम पर पाखण्ड करने वाले का कुतर्क— ये सब मिथ्या है, एवं यदि किसी को भूत बाधा हो तो उपरोक्त में से किसी देव या देवी के सिद्ध साधक के पास जाकर उपचार करवाये तो वह साधक निम्न जाति का है एवं उसे पैसे, मदिरा एवं माँस देकर अपना धन नष्ट करते हैं एवं रोग बढ़ाते हैं। 

सत्य सनातन सिद्धान्ती:— सर्वप्रथम यहाँ ये महोदय उच्च व निम्न जाति के भेद को उत्पन्न कर रहे हैं। एवं उसके लिये जो वे मदिरा, वस्त्र मिठाई, माँस आदि की माँग सम्बन्धी विचार प्रस्तुत कर रहे हैं तो निश्चित ही वे अपने मत को सिद्ध करने के लिये ऐसे ही किसी अपराधी के पास गये होंगे अथवा गये भी या नहीं वे महात्मा ही जाने। परन्तु सत्य तो यह है कि हनुमान्, भगवती पराम्बा, भैरव आदि की उपासना करने वाले बहुतायात में दूध की बनी हुई वस्तुओं का प्रसाद रूप में प्रयोग करते हैं। एवं जिन—जिन स्थानों पर ऐसे साधक बैठे हैं चाहे सालासर बालाजी, अथवा अजमेर के निकट श्मशान भैरव वहाँ आपसे आपके कष्ट निवारणार्थ किसी से कोई पेैसे, वस्त्र, धन, मदिरा, माँस आदि नहीं लिये जाते। यही नहीं, वहाँ श्मशान भैरव का साधक कोई तथाकथित किसी निम्न अथवा उच्च वर्ण का  है अथवा नहीं परन्तु एक उद्योगपति अवश्य है। एवं वहाँ मानव मात्र के कल्याण के लिये साधना करते हुये कुछ समय बिताकर पुन: अपने व्यापार में व्यस्त हो जाते हैं। परन्तु किसी वेद के नाम पर पाखण्ड फैलाने वाले लोगों में सत्य को स्वीकारने व देखने की शक्ति नहीं होने से कोई वहाँ जाकर सत्य नहीं देखता। 

अब हम आते हैं कि ये देवी देवता क्या हैं? तो इसका समाधान करेंगे कि ये वास्तव में प्राणात्मक ऊर्जा का स्वरूप है। जिसे पण्डित मधुसूदन ओझा जी, पण्डित मोतीलाल शास्त्री जी ने इस ऊर्जा को व्यापकता के साथ वेद विज्ञान के आधार पर समझाया है। परन्तु अँग्रेजों द्वारा  हिन्दू समाज में  आपस में वैर उत्पन्न करके हानि पहुँचाने के लिये बने सम्प्रदाय के लोगों के मन में ये सत्य कदापि नहीं आ सकता। क्योंकि अँग्रेजों द्वारा प्रदत्त धन सहायता के लिये इन्हें निष्ठावान् बनना होगा। इसीलिये ये वेद नाम के आवरण को ओढ़ कर सत्य सनातन हिन्दू धर्म की बुराईयाँ ही करेंगे।

यहाँ इन मूर्खों को ये बताया जाय कि आयुर्वेद में शरीर की कई प्रकार की चिकित्साओं में से भूत चिकित्सा का भी वर्णन प्राप्त होता है। अन्य किसी प्रकार के असन्तुष्ट आत्मा के मोक्ष सम्बन्धी वर्णन भागवत् महापुराण में प्राप्त होता है। जहाँ ब्राह्मण द्वारा भागवत् पाठ एवं दान मात्र का उल्लेख है। एवं उसमें पुरूष सूक्त से यज्ञ का भी विधान बताया गया है। अब उसमें कहाँ वस्त्र, धन, मिष्टान्न, मदिरा, माँस आया। किन्तु इन कुतर्कियों के पास कदापि उत्तर नहीं है।

 अपितु ब्राह्मणों का भी विरोध करने लगे क्योंकि उनसे शास्त्रार्थ में हार जो गये। अपनी हार के सत्य को ये कभी उद्घाटित नहीं करते।

सत्य सनातन भारतीय वैदिक संस्कृति ही हम हिन्दूओं की संस्कृति है। इसमें वेद, स्मृति व पुराण ही  प्रमाण के रूप में मान्य हैं। इनमें वेद सर्वोपरि है तदुपरान्त स्मृति तथा अन्त में वेदों के भाष्य रूप में जाने जाने वाले पुराण माने गये हैं।

 

डॉ. दिलीप कुमार नाथाणी विद्यावाचस्पति