शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—5

 

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—5


पुराणों पर विभिन्न विचारकों को पढ़ने के साथ ही यह जानना एवं स्वीकारना भी आवश्यक है कि द्वापर युग की समाप्ति के उपरान्त का कुछ भाग अन्धकारमय है। भारत में बर्बर व आतंकवादी सम्प्रदायों के द्वारा पिछले 1300 वर्षों में व्यवस्थित रूप से बहुत सारा साहित्य जला दिया गया इसका परिणाम यह रहा है कि हमारे पुराणों से सम्बन्धित साहित्य तथा वेद की विभिन्न शाखाओं व ब्राह्मण ग्रन्थों तथा आरण्यकों आदि से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण साहित्य नष्ट कर दिया गया है। 

 भारतीय इतिहास के सन्दर्भ में कई प्रमाण व साक्ष्य नष्ट कर दिये गये। विशेष कर म्लेच्छों के काल में बहुत साहित्य नष्ट कर दिया गया। एवं तात्कालिक धर्मविरोधी उन्माद की स्थिति में हमारे विद्वानों ने धर्मशास्त्रीय दर्शन की सुरक्षा को आवश्यक माना इसीलिये उनकी प्रतिलिपियाँ होती रहीं एवं भारत के लगभग सभी आर्य नरेशों के पुस्तकालय में सुरक्षित रही जो वर्तमान में पढने में आ रही हैं। इसी माध्यम से कथमपि अपने साहित्य की अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण साहित्य रचनाओं का सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया। किन्तु जो हम क्षेत्रीय स्तर के साहित्य की चर्चा करें तो बहुत सा ऐसा क्षेत्रिय स्तर पर लिखा गया साहित्य नष्ट ही हो गया।

आप सभी जो नित्य पढ़ रहे हैं  इस शृँखला को उनके लिये आज का संवाद किंचित् विषय से हट कर है। किन्तु पूर्व के सारे संवाद में कुछ प्रश्न उठे जिनके उत्तर देने आवश्यक हैं।

1.शंकराचार्य ने भी परापूजा नामक एक ग्रन्थ लिखा जिसमें निराकार ब्रह्म की उपासना का वर्णन मिलता है। अत: शंकराचार्य को तो सनातनी मानते हैं फिर वे मूर्त्तिपूजा क्यों करते हैं?

समाधान:— द्वापर युग के बाद कलियुग में शंकराचार्य प्रथम हुये हैं जिन्होंने तात्कालिक समय में उपलब्ध सम्पूर्ण सनातन आर्ष संस्कृत साहित्य को संकलित किया उसकी पुन: स्थापना की। ऐसे में उन्होंने वेदों में वर्णित निराकार व साकार ब्रह्म देानेां की साधना विधि को प्रकाशित किया। षडविंशब्राह्मण का प्रथम सूत्र ही ये है— ''ब्रह्म च वा इदमग्रे सुब्रह्म चास्ताम्।।1।।'' सर्ग के आदि मे ब्रह्म व सुब्रह्म सर्वप्रथम हुये। इसमें ब्रह्म यानि परात्पर ब्रह्म जो अनिर्वचनीय हैं। उसे साकार अथवा निराकार दोनों में से किसी भी शब्द से नहीं बताया जा सकता क्योंकि ये दोनों ही शब्द परस्पर विलोम शब्द है। एवं द्वितीय सुब्रह्म उसी परात्पर का दैवीय स्वरूप जिसकी यज्ञ से पूजा होती है। एवं साकार है इन दोनों में अभेद है। ये ब्राह्मण ग्रन्थों के वचन हैं। इनमें जो अविश्वास करता है। वह नास्तिक है क्येांकि नास्तिकों वेद निन्दक: ऐसा मनु कहते हैं।

शंकाराचार्य ने इसी षड्विंश ब्राह्मण के प्रथम सूत्र को लेकर साकार व निराकार उपासना को व्याख्यायित किया था।  

जगद्गुरू आदि शंकाराचार्य ने न केवल वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना की वरन्स्था मनुष्य जीवन के मोक्ष मार्ग के लिये प्रस्थान त्रयी के नाम से उपनिषद, ब्रह्मसूत्र व गीता को स्थापित किया। इसीलिये उनके द्वारा इन तीनो पर भाष्य प्राप्त होते हैं। ब्रह्मसूत्र के भाष्य में उन्होंने कई स्थलों पर प्रमाण के लिये यथा स्मृति: कहा है। वे अपने दर्शन के प्रमाण के रूप में धर्मशास्त्रों को मानते हैं। यथा पुराण व स्मृतियाँ आदि। ऐसे में वे मूर्त्ति पूजा के विरेाधी कैसे हो सकते थे। ईश्वर के जितने भी स्वरूप हैं शिव, विष्णु, सूर्य, गणपति, दैवी आदि इन सभी पर उन्होंने कई  स्तोत्रो की रचना की है। यही नहीं पंचदेवोपासना की भी पुनर्स्थापना ही शंकराचार्य ने की है। इनमें शिव, विष्णु, गणपति, सूर्य एवं शक्ति पाँच देवों के रूप में हैं। यही पंचदेवोपासना वर्तमान पर्यन्त अक्षुण्ण चली आ रही है। 

इसी प्रकार उन्होंने परात्परब्रह्म की साधना के लिये उपनिषदों के प्रमाण दिये वहीं उन्हेांने कई अन्य स्थलो से भी प्रमाण दिये। यही तथ्य परापूजा में प्राप्त होता है। एवं जिस मत की जहाँ स्थापना की जाती है वहाँ उस मत के मण्डन के साथ शेष सारे मतों का खण्डन भी किया जाता है। यही कारण रहा कि कुछ पाखण्डी वेद भक्तों को शंकराचार्य के लिये भ्रान्ति उत्पन्न हो गई।

 अब उनके कुछ नकली समर्थक उन्हें भी स्वयं की तरह पाखण्डी सिद्ध करने पर तुले हुये हैं। जगद्गुरू आदि शंकराचार्य को शिवावतार मानने में उनको भय लगता है। कि कहीं उनके द्वारा निराकार उपासना को झूठा ढकोसला बनाया हुआ है। वह टूट न जाय। इससे तो अच्छा है कि उन्हें माने ही नहीं। किन्तु ऐसा कहने पर तो पूरा समाज ही झूठा सिद्द्ध हो जायेगा। इसीलिये अच्छा है हम जगद्गुरू आदि शंकराचार्य को भी अपने समाज में ही मिला देते हैं। पर हमारे समाज की स्थापना तो कल हुई है। तो ठीक है जगद्गुरू आदि शंकराचार्य को  हमें निराकार सिद्ध कर देते हैं। ये सर्वविदित है इनसे बड़े कुतर्की सम्पूर्ण विश्व में नहीं मिलेंगे।

शंकराचार्य ने ही एक अत्यन्त मनोरम चेतावनी परक भजन लिखा है भज गाविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ मते। न हि न हि रक्षति डूकृंकरणे। ऐसे में यदि वे मूर्त्ति पूजा विरोधी  होते तो। भज गोविन्दं ही क्यों लिखते?

वेद के नाम पर पाखण्डी समाज का कुतर्की :—जगद्गुरु शंकराचार्य जी ने गीता पर पूरा भाष्य नहीं लिखा उनका प्रथम अध्याय पर कोई भाष्य उपलब्ध नहीं होता है

सनातनी:— शंकराचार्य जी का गीता भाष्य पूरा पढ़ा है?

वेद के नाम पर पाखण्डी समाज का कुतर्की :— हाँ पूरा पढ़ा है

सनातनी:—पूरा पढ़ने से तात्पर्य केवल अन्तिम पृष्ठ पढ़ना नहीं है मूर्ख! उसकी प्रथम पंक्तियाँ पढ़ी हैं?

वेद के नाम पर पाखण्डी समाज का कुतर्की :— नहीं उसमें ऐसा क्या है?

सनातनी:— उसी में ही प्रथम अध्याय की व्याख्या शंकराचार्य करते हुये कहते हैं कि प्रथम अथ्याय में जो मोह है उसकी व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है वह सामान्य रूप से सभी में है अत: अर्जुन को जो विशाद है उसकी भिन्न व्याख्या की आवश्यकता नहीं है इसीलिये द्वितीय अध्याय से ही प्रारम्भ करते हैं।

वेद के नाम पर पाखण्डी समाज का कुतर्की :— ऐसा लिखा है तो क्या हुआ?

सनातनी:— इसका तात्पर्य है कि जो यह अनर्गल प्रलाप प्रचारित किया हुआ है कि शंकराचार्य जी ने गीता के प्रथम अध्याय को माना ही नहीं है अथवा उस समय था ही नहीं प्रक्षेपित है आदि आदि जो अशास्त्रीय धारणाएँ प्रचारित करके शंकराचार्य का मूर्तिपूजा विरुद्ध बताने का षड्यन्त्र कर रहे हैं वह व्यर्थ है। तात्पर्य है कि शंकराचार्य जी के अनुसार प्रथम अध्याय में जो अर्जुन ने शंका रखी है वह जनसामान्य में स्वाभाविक है। अत: उसकी व्याख्या की आवश्यकता नहीं है। 


डा दिलीप कुमार नाथाणी (विद्यावाचस्पति)


बुधवार, 23 दिसंबर 2020

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना —4

 

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना —4

पुराणों की पौराणिकता, भारतीय धर्म दर्शन में उनकी प्रासंगिकता एवं भारतीय जनमानस में पुराणों का अन्तर्ग्रन्थन सम्बन्धी अभी कई तथ्य प्रस्तुत किये गये हैं। पुराणों के सन्दर्भ में भारतीयों में अन्य कई विद्वान् हुये हैं जिन्होंने इनकी पौराणिकता के सन्दर्भ में पर्याप्त तर्क सप्रमाण प्रस्तुत किये हैं। इनमें कल हमने कुछ विद्वानों को पढ़ा था। आज भी कुछ भारतीयों के प्रमाण प्रस्तुत कर पाश्चात्यों के मत प्रस्तुत करेंगे।

पाण्डुरंग वामन काणे:— महामहोपाध्याय पी.वी. काणे के अनुसार निरुक्त से प्रकट होता हैं कि यास्क से बहुत पहले रिक्थाधिकार (यानि हिस्सेदारी) के प्रश्न को लेकर विचार—विमर्श हुये तथा पुत्रों एवं पुत्रियों को रिक्थ—निषेध तथा पुत्रिका को अधिकार प्राप्त हो सकता है। रिक्थाधिकार सम्बन्धी यही विचार—विमर्श कालान्तर में लिपिबद्ध हो गये हों। रिक्थसम्बन्धी ( हिस्सेदारी अथवा विल) वार्त्ता की ओर यास्क ने जिस प्रकार संकेत किया है, इससे यही सिद्ध होता है कि उन्होंने कुछ ग्रन्थेां की ओर निर्देश किया है, जिनमें वैदिक वचनो के उद्धरण दिये गये थे—

अथैता जाम्या रिक्थप्रतिषेध उदाहरन्ति ज्येष्ठ पुत्रिकाया इत्येके। एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि रिक्थ के विषय में यास्क ने एक पद्य का उद्धरण दिया है, जिसे वे ऋचा न कहकर श्लोक कहते हैं—तदेतदृक्थलोकाभ्यामभ्युक्तम्। अंगादंगात्सम्भवति..... स जीव: शरद: शतम्। अविशेषेण पुत्राणं दायो भवति धर्मत:। मिथुनानां विसर्गादौ मनु: स्वायम्भुऽवोब्रवीत्। निरुक्त 3.4.5.

इससे स्पष्ट हो जाता है कि धर्म—सम्बन्धी ग्रन्थ श्लोक—छन्द में या श्लोकों में प्रणीत थे। यदि धर्म—सम्बन्धी ग्रन्थ यास्क के पूर्व विद्यमान थे, तो धर्मशास्त्रीय ग्रन्थेां की तिथि विक्रम से कई शताब्दियाँ पूर्व की मानी जायेगी।  इस विषय में अन्य प्रमाण भी हैं, यथा गौतम, बौधायन तथा  आपस्तम्ब के धर्मसूत्र जिनमें धर्मशास्त्रों की पुराण व इतिहास के रूप में चर्चा की गई है।

गौतमधर्मसूत्र:— तस्य च व्यवहारो वेदो धर्मशास्त्राण्यंगानि उपवेदा: पुराणम्। गौतम धर्मसूत्र 9.21

इस सूत्र  में आचार्य गौतम ने पुराणों को उपवेद भी कहा है। तथा उन्हें धर्मशास्त्र भी कहा गया है। अत: सूत्र ग्रन्थ यानि कल्प नामक वेदांग में पुराणों को प्रमाण रूप स्वीकार किया गया है।  पुन: बौधायन ऋषि लिखते हैं:— धर्मशास्त्ररथारूढ़ा वेदखड्गधरा द्विजा:। क्रीड़ार्थमपि यद्ब्रूयु: स धर्म: परम: स्मृता:। बौधायनधर्मसूत्र 1.13) अर्थात् धर्मशास्त्र रूपी रथ पर आरूढ होकर वेद रूपी तलवार धारण करने वाले द्विज जो भी कुछ आचरण आदि के सन्दर्भ में कहें। वह सब धर्म ही है। यहाँ बौधायन ने धर्मशास्त्र व वेद से युक्त होना ही द्विज की योग्यता बताई तथा ऐसे व्यक्ति के वाक्यों को ही धर्म कहा। इस प्रकार धर्मसूत्र के धर्मशास्त्रों के होने का प्रमाण प्राप्त होता है। बौधायन ने धर्म की व्याख्या करते हुये स्मार्तो द्वितीय ऐसा कहा है जिसका स्पष्ट अर्थ है कि वेद धर्म का प्रथम उपादान है, तथा स्मार्त्त धर्म द्वितीय है, अत: यह भी पुष्ट प्रमाण है कि सूत्रग्रन्थों के रचना के समय स्मृतिग्रन्थ उपलब्ध थे अथवा धर्मशास्त्र को स्मृति के नाम से कहा जाता था। परन्तु दोनों ही स्थितियाँ धर्मशास्त्रों के सूत्र ग्रन्थो के साथ—साथ होने को प्रमाणित करती है—पूर्वमीमांसा (6.7.6)—शूद्रश्च धर्मशास्त्रत्वात्तत्र। यहाँ भी आश्रम सम्बन्धी नियमों के लिये धर्मशास्त्रों को प्रमाण माना है। यह प्रमाण पूर्वमीमांसा सूत्रकार जैमिनी दे रहे हैं। ​इसका तात्पर्य है कि दर्शन सूत्रों की स्थापना के समय स्मृतियाँ व पुराण वर्तमान थे एवं दार्शनिकों ने वेद की ही भाँति इन्हें भी प्रमाण माना। आपस्तम्ब कहते हैं—पुन: सर्गे बीजार्था भवन्तीति भविष्यत्पुराणे। आपस्तम्ब धर्मसूत्र 2.9.4.6)  आपस्तम्ब धर्मसूत्र में तो आपस्तम्ब ने स्पष्ट रूप से न केवल पुराणों का उल्लेख किया है अपितु पुराण का नामोल्लेख तक कर दिया है। इस प्रकार पी.वी.काणे महोदय ने कई प्रमाण प्रस्तुत किये, उन्होंने उन मतों को नहीं माना, जिनमें यह सिद्धान्त प्रतिपादित करने का प्रयास किया गया कि सूत्र—ग्रन्थो के उपरान्त अनुष्टुप् छन्द वाले गन्थ प्रणीत हुये। इसके विपक्ष में प्रमाण देते हुये पी.वी.काएणे महोदय लिखते हैं कि उन दिनों के ग्रन्थों के विषय में हमारा ज्ञान इतना न्यून है कि इस प्रकार का सामान्यीकरण समीचीन नही है। श्लोक—छन्द वाला ग्रन्थ मनुस्मृति कुछ धर्मग्रन्थों से , जैसे विष्णुधर्मसूत्र से प्राचीन और वसिष्ठधर्मसूत्र का समकालीन है। कुछ प्राचीनतम धर्मसूत्रों में, यथा बौधायन लम्बे लम्बे प्रबन्ध श्लोक छन्द में पाये जाते हैं। एवं उनमे कुछ तो उद्धरण मात्र हैं। यहाँ तक कि आपस्तम्ब में भी बहुत से श्लोक प्राप्त होते हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि श्लोक—बद्ध ग्रन्थ धर्मसूत्रों से पूर्व भी विद्यमान थे। इनके अतिरिक्त तथा बौधायन के समय में धर्म—सम्बन्धी एक बृहत् साहित्य था जो वर्तमान में उपलब्ध नहीं है। (धर्मशास्त्र का इतिहास भाग—1, पी.वी.काणे, पृ.11)

यहाँ बताना आवश्यक है कि जिन सूत्र ग्रन्थों का ऊपर प्रमाण दिया गया है वे सूत्र ग्रन्थ छ वेदांगों में से कल्प नामक वेदांग के अंग हैं अत: जब स्मृतियों व पुराणों का वेदांगों में उल्लेख प्राप्त होता है, तो वह नवीन कृति कैसे हो सकती है। दूसरा वह प्रमाण क्यों नहीं? उसमें झूठ व पाखण्ड कैसे आ गया? आदि आदि प्रश्न उनके लिये हैं जो कुतर्कों के आधार पर पुराणों को मिथ्या प्रवंचना कहते आये हैंं। मेरी इन आलेखों की शृँखला का एक उद्देश्य ''झूठार्थतम भंजनम्'' भी है। अर्थात् पुराणों को अपमानित करने के लिये वैदेशिकों से धन प्राप्त कर जो पुराण विरोधी, सनातन धर्म परम्परा विरोधी ग्रन्थ लिखे गये। उनके कुतर्को का तर्कपूर्णविधि से व सप्रमाण विच्छेद किया जाय।

कल एक पाठक ने प्रश्न किया था कि पुराण किसे कहा है तो उसकी परिभाषा इस प्रकार है— निरुक्तकार यास्काचार्य ने पुराण शब्द को समझााते हुये लिखा है—पुरा नवम् इसी प्रकार मालविकाग्निमित्रम् में पुराण शब्द को निर्वचित करते हुये कहा है पुराणामित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम् ।। मालविकाग्निमित्रम् 1.2।। रघुवंशम में कालिदास ​ने लिखा है पुराणपत्रापगामादनंतरम्।। 3.7।।  श्रीमद्भगवत् गीता में भी पुराण शब्द को समझाया गया है—'' वयोवृद्ध, पुरातनख् अजो नित्य: शाश्वतो5यं पुराण:।।2.20।। इस प्रकार पुराण शब्द विभिन्न अर्थों में प्रकट हुआ हैं किन्तु पुराण शब्द का धर्मशास्त्रीय रूप में अर्थ मत्स्य पुराण में लिखा है—

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि। 

वंशानुचरितंचैव पुराणं पंचलक्षणम्।। 

जिन ग्रन्थेा में सर्ग अर्थात् सृष्टि उत्पत्ति , प्रतिसर्ग यानि सृष्टि का लय होना, वंश ,मन्वनतर और वंशचरित इन पाँचो का उल्लेख प्रापत होता है। वही पुराण हैं। इसीलिये याज्ञवल्क्य स्मृति के श्लोक पर वीरमित्रोदयकार ने टीका करते हुये लिखा''पुराणं ब्राह्मादि वक्ष्यमाएा''।

मेरे इन आलेखों से कई झूठार्थतमानुयायियों की स्थिति विकट हुई है। एवं वे तर्क करने, मेरे आलेखों का प्रत्युत्तर देने की अपेक्षा मेरे ऊपर व पुराणों पर अनर्गल टिप्पणियाँ कर रहे हैं। मेरा यह मानना है कि इस महान् भारत की भारती सन्तति है उसमें निराकार व साकार उपासक साथ साथ रहते आये हैं। साकार उपासकों को कभी निराकार उपासकों से न तो वैर रहा है। न ही रहेगा। किन्तु निराकार उपासकों की स्थिति अत्यन्त वैषम्यपूर्ण, द्वेष, ईर्ष्या युक्त है। एवं उनको पुराणो व मूर्त्ति पूजा से वैर है इसके विरोध हेतु विवेकान्ध वे किसी निम्नस्तर तक पहुँच सकते हैं। अपित पहुँच रहे हैं। वर्तमान में महान् भारत को उसकी प्राचीन सनातन परम्परा व संस्कृति ही अपना गौरवपूर्ण शिखर तक पहुँचा सकती है। अत: जो कोई भी निराकार उपासक अनावश्यक रूप से साकार उपासना व मू​र्त्ति पूजा का विरोध करता है। वह निश्चित ही राष्ट्रद्रोही  व धर्मद्रोही है।


डॉ.दिलीप कुमार नाथाणी विद्यावाचस्पति

सोमवार, 14 दिसंबर 2020

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—3


 

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—3

वल्लभाचार्य ने पुराणों की प्रासंगिकता व औचित्य पर प्रकाश डालते हुये कहा है कि—

यन्न दृष्टं हि वेदेषु तं दृष्टं स्मृतिभि: किल। 

उभाभ्यां यन्न दृष्टं हि तत्पुराणेषु गीयते।

अर्थात् जो हमें वेदों में दिखाई नहीं देता वह स्मृतियों से समझा जा सकता है एवं जो स्मृतियों ने नहीं दिखाई देता वह पुराणों में वर्णित है। इस श्लोक का तात्पर्य है कि वेदों में सारा ज्ञान सूत्रात्मक रूप से वर्णित है। ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति उसको समझने में सक्षम नहीं हेाता है तो उस ज्ञान को उन्हीं ऋषियों ने सरल रूप से स्मृतियों में प्रस्तुत किया गया है। जब कोई साधारण मति मनुष्य जो कि वेद के ज्ञान को समझना चाहता है किन्त उतना श्रम व तपस्या नहीं कर सकता तो उसके लिये ऋषियों के द्वारा पुराणों की रचना की गई। इस प्रकार यह पुराणों का महत्त्व, प्रासंगिकता व औचित्य सभी को प्रकट करता है। अब मैं पुराणों के सम्बन्ध में प्राचीन ग्रन्थों में क्या कहा गया है उसके प्रमाण दूँगा। क्योंकि जिन्होंने सत्यार्थ प्रकाश पढ़ा उन्होंने पुराणों के सन्दर्भ में मात्र वही तथ्य पढ़ें जिन्हें लेखक ने लिखा। किसी भी विषय के सन्दर्भ में पक्ष व विपक्ष दोनों को पढ़े बिना निर्णय करना असम्भव व अनुचित है। पुराण विषयक जो विपक्ष है उसे सत्यार्थ प्रकाश में दिया गया है। इसके विपरीत  न्यून से न्यून 2500 वर्षों से जो पुराण प्रत्यक्ष हैं उसके लिये बिना विचारे मात्र एक लेखक के द्वारा प्रस्तुत चन्द पंक्तियों के आधार पर उस परम्परा का त्याग करना कथ​मपि उचित नहीं है। अत: मैं यहाँ पुराणो के पक्ष की स्थापना करना चाहता हूँ। पुराणों के सन्दर्भ में प्राचीन ग्रन्थेां मे जो प्रमाण दिये गये वे निम्न प्रकार हैं।

1.मत्स्य पुराण मे कहा है कि वेद के ज्ञान को सरलता से समझने के लिये ही धर्मशास्त्रो व पुराणेां की रचना की गई—

अंगानि चतुरो वेदा: पुराणन्याविस्तरा:। 
मीमांसा धर्मशास्त्राणि परिगृह्यात्मसात्कृतम्।

वेद के छ: अंगों के साथ ही उसके समझे जाने के प्रसंग से चार अंगों की भी स्थापना की गई है। वे हैं पुराण, न्याय दर्शन, मीमांसा व धर्मशास्त्र (स्मृतियाँ)।

2. पाणिनी अष्टाध्यायी के चतुर्थ अध्याय के तृतीय पाद का 105 वाँ श्लोक है '' पुराणप्रोक्तेषु ब्राह्मणकल्पेषु'' इस सूत्र का अर्थ है पुराणों, ब्राह्मण व कल्पों में यहाँ ये तीनों ही ग्रन्थ हैं। वैसे कई सनातन पुराण परम्परा विरोधियों ने अपनी पुस्तकों में इस सूत्र के पुराण शब्द का अर्थ भी ब्राह्मण ग्रन्थ ही किया है। किन्तु पाणिनि जैसे व्याकरणाचार्य जहाँ एक मात्रा तक की  त्रुटि नहीं कर सकते वे एक ही ग्रन्थ को प्रस्तुत करते हुये पर्यायवाची शब्द का प्रयोग करते हुये दो बार एक ही ग्रन्थ का उल्लेख क्यों करेंगे।

3.याज्ञवल्क्य शिक्षा के प्रकार को समझाते हुये अपने स्मृति ग्रन्थ याज्ञवल्क्य स्मृति में लिखते हैं कि पुराण 14 प्रकार की शिक्षाओं में से एक अंग है—

पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्रांगमिश्रिता:। 
वेदा: स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतु​र्दश। 

(याज्ञवल्क्य स्मृति, वीरमित्रोदय परिभाषा प्रकाश, भाग—1पृ11

अर्थात् पुराण, न्याय, ​मीमांसा, धर्मशास्त्र, छ: वेदांग व चार वेद ये कुल 14 विद्या व धर्म प्राप्ति के साधन हैं। इसी श्लोक की प्राप्ति विष्णुपुराण में भी होती है। विष्णु पुराण ने छ: वेदांगों के साथ चार उपवेदों केा जोेड़कर विद्या व धर्म के 18 स्थल अथवा साधन बताए हैं—

अंगानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्याविस्तर:। 
धर्मशास्त्रं पुराणं च विद्या ह्येताचतुर्द्दश:।।
आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वश्चेति ते त्रय:।
अर्थशास्त्र चतुर्थ तु विद्या ह्यष्टदशैव ता:।। 

विष्णु पुराणम्

अर्थात् चारवेद, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र (स्मृतियाँ), पुराण, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद, अर्थशास्त्र इस प्रकार विद्या के कुल अट्ठारह प्रकार कहे गये हैं। वीरमित्रोदय कार मित्रमिश्र ने विष्णु पुराण के इस श्लोक पर टीका करते हुये कहा है कि इसमें प्रथम चौदह प्रकार तो विद्या व धर्म दोनेां की प्राप्ति करात हैं। एवं शेष चार अर्थ को समझाते हैं, तथापि ये धर्म के अनुषांगिक हैं।

4. अब अन्त में पण्डित भगवद्दत्त जो कि आर्यसमाजी हैं एवंं वैदिक वाङ्मय का इतिहास के प्रथम खण्ड में प्रमाण देते हुये न्याय सूत्र 4.6.62 पर भाष्य करते हुये एक ब्राह्मण ग्रन्थ का प्रमाण देकर वात्स्यायन मुनि लिखते हैं— य एवं मन्त्रब्राह्मणस्य द्रष्टार: प्रवक्तारश्च ते खल्वितिहासपुराणस्य धर्मशास्त्रस्य चेति। अर्थात् जो मन्त्र द्रष्टा ​ऋषि थे वे ही इतिहास यानि रामायण महाभारत पुराण व धर्मशास्त्र यानि स्मृतियों के रचनाकार हैं। पण्डित भगवद्दत्त न्यायभाष्य का एक अन्य उदाहरण देते हुये लिखते हैं— य एवाप्ता वेदार्थाना द्रष्टार: प्रवक्तारश्च त एवायुर्वेदप्रभृतीनामिति। अर्थात् जो वेदार्थ द्रष्टा तथा प्रवक्ता हैं वे ही आयुर्वेद आदि के भी हैं। इन दोनों वचनों से यही तात्पर्य स्पष्ट होता है कि आप्त यानि साक्षात्कृतधर्मा लोग वेदार्थ के द्रष्टा भी थें वह वेदार्थ उन्होंने धर्मशास्त्रों में प्रकट किया। इसीलिये वे ऋषि ही महर्षि कहलाये। पण्डित भगवद्दत्त ने गौतम बुद्ध का वाक्य इस सम्बन्ध में प्रमाण रूप में प्रस्तुत किया है  जोकि इस प्रकार है— वेद और ऋषियों के विषय में तथागत बुद्ध की सम्पत्ति के विषय में शान्तरक्षित अपने तत्तवसंग्रह में लिखता है—यथोक्तं भगवात—इत्येते आनन्द पौराणा महर्षयो वेदानां कर्त्तारो मन्त्राणां प्रवर्तयितार:। ( वैदिक वाङ्मय का इतिहास—1, पृ—14) अर्थात् बुद्ध ने कहा— हे आनन्द! ये पुराणो के रचयिता महर्षि थे, जिन्होंने पूर्व में वेद बनाए, और मन्त्रों को प्रवृत्त किया। इसमें वेदकर्त्ता  से तात्पर्य वेद की शाखा का प्रवर्तन है।

5. युधिष्ठिर मीमांसक— ये भी परम आर्यसमाजी हैं इन्होंने व्याकरण शास्त्र का इतिहास नामक ग्रन्थ लिखा है उसमें इन्होंने शतश: प्रमाण पुराणों के आधार पर प्रस्तुत​ किये हैं। आचार्य वात्स्यायन के प्राचीन ऐतिह्य—सिद्ध सिद्धान्त की पुष्टि में न्यायभाष्य से पूर्वकालिक  प्रमाण प्रस्तुत करते हुये लिखते हैं कि जैमिनि शाखा व उसके ब्राह्मण ग्रन्थ के प्रवक्ता भारतयुद्धकालीन महामुनि जैमिनि ने पूर्वमीमांसा के कल्पसूत्र—प्रामाण्याधिकरण में लिखा है कि— अपि वा कर्तृसामान्यात् तत् प्रमाणमनुमानंस्यात्। (पूर्व मीमांसा कल्पसूत्र प्रमाण्याधिकरण 1.3.2) अर्थात् कल्पसूत्रों की जिनका मूल आम्नाय में नहीं मिलता, वे अप्रमाण नहीं हैं। आम्नाय और कल्पसूत्रों के कर्त्ता प्रवक्ता समान होने से, आम्नाय में अनुक्त कल्पसूत्र की विधियों का भी प्रामाण्य है। अर्थात् जिन ऋषियों ने आम्नाय यानि वेद की शाखाओं और ब्राह्मण ग्रन्थों का प्रवचन किया, उन्होंने ही कल्पसूत्रों की भी रचना की, अत: यदि उनका वचन ग्रन्थ में प्रमाण है, तो दूसरे में स्वयंसिद्ध प्रमाण है।

आज मैंने  वे प्रमाण दिये हैं जो आधुनिक युग के लोगों ने पुराणों की प्रामाणिकता के सन्दर्भ में प्रस्तुत किये हैं। ये सभी भारतीय विचारकों के हैं। किन्तु भारतीय धर्मदर्शन व पुराणों के परिप्रेक्ष्य मे जो वैदेशिकों ने सत्यार्थ कार्य किया है वह मैं आगे प्रस्तुत करूँगा।

                                 

डॉ.दिलीप कुमार नाथाणी विद्या वाचस्पति

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—2

 

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा
मण्डनम् व पुराण स्थापना—2

यदि किसी थान आदि की चर्चा की जाय तो वहाँ कोई भी आपसे मद्य आदि की माँग करे तो वह अनुचित है। ये तथ्य सही है। एवं ऐसा करने वाले कुछ दुष्ट प्रकृति के लोग रहे भी होंगे। किन्तु वर्तमान में दैवी व भैरव आदि के कई स्थलों पर ऐसी किसी वस्तु को प्रसाद के रूप में चढ़ाने वहाँ बाँटने आदि के लिये स्पष्ट मना किया जाता है। तथापि सारे तथ्य उन लोगों के सन्दर्भ में दिये जा रहे हैं जो मूर्त्ति पूजा के नाम पर पाखण्ड करते हैं। एवं  ऐसे जितने भी लेखक महोदय हैं उन्होंनेउन्हीं पाखण्डों को अनुचित ठहराया है। किन्तु उनके अनुयायियों ने ग्रन्थ में वर्णित पाखण्डी लोगों की तरह सभी प्रकार की मूर्त्ति पूजा व मूर्त्ति पूजकों को मान लिया, एवं उसके लिये कुतर्कों की पुस्तकें रच डाली उसका लाभ म्लेच्छों ने लिया और पहले तो मूर्त्ति पूजा का एवं उसके उपरान्त पूर्ण सनातन संस्कृति व परम्परा का विरेाध करने लग गये हैं।

यहाँ लेखक ने मूर्त्ति पूजा के आधार पर ढोंगी लोगों के कर्मों को समझाया है इन बन्धुओं ने उसे  मूर्त्ति पूजा के सम्पूर्ण क्रम को ही इन ढोंगियों के अनुसार ग्रहण कर लिया। मूर्त्ति पूजा  पूर्णत: एक विज्ञान है। इसी कारण मूर्त्तियाँ कैसी हों, किस पत्थर से बनी हों, किस देवता की मूर्त्ति किस पत्थर व किस किस आकार की हों। कुछ देवता यथा महादेव, विष्णु आदि के स्थायी निवास जिन जिन नदियों अथवा भू—प्रदेशों में  होने से उन उन नदियों के पत्थर तत्समबन्धी देवताओं के  विग्रह ही हैं। उनकी स्थापना आदि की आवश्यकता नहीं होती। विभिन्न देवी—देवताओं की मूर्त्तियों के अंग यथा हाथ हाथों की मुद्राएँ आदि कैसी हों उनके नेत्र व मुख किस दिशा में हों। उनके कौन कौन से अस्त्र किस हाथ में हों इस प्रकार की प्रत्येक दशा का विभिन्न परिणाम आदि  का वर्णन हमें  कई ग्रन्थों में प्राप्त होता है। जिनमें गरुड़ पुराण, अग्नि पुराण में सर्वाधिक है। इसके अलावा विभिन्न ग्रन्थ जिनमें वास्तु से सम्बन्धित ग्रन्थों में मूर्त्तियों की स्थापना व स्वरूप लक्षण उनके परिणाम आदि पर विस्तृत चर्चा प्राप्त होती है।  मूर्त्ति पूजा इतनी ही मिथ्या होती एवं व्यर्थ होती तो उस पर इतनी अधिक चर्चा क्यों होती। एक ग्रन्थ को पढ़कर सहस्र वर्षों के ज्ञान को तिलांजलि देना भी तो अन्ध श्रद्धा ही है। अपितु महामूर्खता है।

वेद पर सायण, महीधर, श्रीस्वामी, आदि कई विद्वानों ने अपने भाष्य लिखे एवं समझाया है परन्तु इनमें से किसी ने मूर्ति पूजा का विरोध नहीं किया। परन्तु एक अंकल जी तो सायण आदि दिव्य व्यक्तित्वों को ही अभद्र शब्दों से ताड़ना करता है। मुझे तो ये अंकल जी वास्तव में अंकल यानि अन अकल ही दीखते हैं।

सहस्रों वर्षों से देवलायों एवं उनमें देवविग्रहों की स्थापना होती आई है। कई सहस्राब्दियाँ प्राचीन मन्दिरों के भग्नावशेष हमें प्राप्त होते हैं। यहाँ तक पाणिनी अष्टाध्यायी में भी इस प्रकार के कई सूत्र प्राप्त होते हैं।  यही नहीं पिछली कुछ शताब्दियों से जब से यूरोप वासी भारत में आये तो उन्होंने यहाँ कि मूर्त्तियाँ चोरी करके  यूरोप व अन्य पश्चिमी देशों में मूँहमाँगे दामेां पर बेची हैं। वहाँ लाल बन्दर जैसे मुँह वाले गोरे उन्हें बड़े ही मान सम्मान के साथ अपने घरों में स्थापित कर रहे हैं। उनको उसका सकारात्मक लौकिक व आध्यात्मिक लाभ भी मिल रहा है। पर नहीं हमारे एक व्यक्ति के मन मे आ गया कि साकार उपासना नहीं करनी तो अब हम प्रयासरत रहेंगे कि मूर्त्ति पूजा का विरोध करेंगे। चाहे कितने कुतर्क देन पड़ें। कितने ही सत्यों को असत्य कहना पड़े।

ये म्लेच्छों के समय में ही मूर्त्ति पूजा समाप्त करने का एक षडयन्त्र था इसके लिये उन्होंने विभिन्न समाजों, संगठनों, परिषद्, सोसा​यटियों की स्थापना करके उसके द्वारा मूर्ति पूजा का विरोध करने का प्रयास किया था। किन्तु वह षडयन्त्र असफल रहा। बंगाल में बंकिमचन्द्र चटोपाध्याय, शरतदचन्द्र आदि ने अपने साहित्य मे इनके मत का खण्डन किया एवं  ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जैसे समाज सुधारकों ने सामाजिक जन जागृति के द्वारा वहीं इस ब्रह्म समाज की समाधि भी बना दी जहाँ इसकी स्थापना हुई थी।  लगभग आधी शताब्दी उपरान्त एक महोदय ने वेद के आधार पर मूर्त्ति पूजा का विरेाध प्रारम्भ किया। उसका प्रभाव पड़ा तो अँग्रेजों को भारतीय संस्कृति को समाप्त करने का ये उत्तम अवसर दिखा एंव उन्होंने  किसी भी एक समाज विशेष पर पर कभी भी प्रतिबन्ध नहीं लगाया। यद्यपि अँग्रेजों ने भारतीय शिक्षा पद्धति यहाँ के गुरूकुल, उद्योग धन्धे सभी को समाप्त करने के लिये विभिन्न विधिनियिम बनाये किन्तु अँग्रेजों  संस्था के विरूद्ध कोई कठोर व अनुशासनात्मक कार्यवाही नहीं की थी। जिन जिन  समाजियों ने अँग्रेज सरकार के विरोध में भारतीय स्वतन्त्रता हेतु जो सत्कार्य किया उनके विरूद्ध व्यक्तिश: स्तर पर कार्यवाही हुई। किन्तु उसका प्रभाव संस्था पर नहीं हुआ। 

इसका सर्वाधिक प्रभाव साधुओं के संगठनों पर पड़ा एवं उनपर भयंकर अत्याचार हुये। वे सभी सन्यासि मूर्त्तिपूजक थे। अँग्रेजों ने भयंकर तरीके से इन सनातनी सन्यासियों पर अत्याचार किये। एवं इतिहास में से उनका नाम मिटा दिया। अँग्रेज म्लेच्छों का कार्य एक स्तर पर नहीं होता था उसके कई कई स्तर होते थे। उनके मस्तिष्क में राजस्थापना के साथ ही यहाँ की मूल संस्कृति व परम्परा व धर्म को समाप्त करना भी था। वे मूर्त्ति पूजा के सभी सम्भावित प्रमाणों को नष्ट करना चाहते थे।

इसी क्रम मे जिन  सनातनी परम्परा व मूर्त्ति पूजक संस्थाओं से सम्बन्धित लोगों ने स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लिया तो उनको पूरी तरह से संस्था सहित समाप्त करने का प्रयास किया गया। जिसमें हिन्दू महासभा, एवं उनके अनुषांगिक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख थे। अँग्रेज म्लेच्छों ने इनके कार्यकर्त्ताओं के साथ इन संगठनों को भी हानि पहुँचाई। हिन्दू महासभा को तो भारत की स्वतन्त्रता के उपरान्त भी प्रतिबन्धित किया गया।

इसका सर्वश्रेष्ठ प्रमाण है समाज सुधारकों के आधुनिक इतिहास में राजाराम मोहन राय, , ऐनी बिसेण्ट थियोसोफिकल सोसाइटी ब्रह्मसमाज को तो पढ़ाया जाता है। किन्तु सावरकर, ईश्वर चन्द विद्यासागर, वेद समाज, हिन्दू महासभा, राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ आदि को नहीं पढ़ाया जाता है।

ये तथ्य स्पष्ट करता हैं कि मूर्त्ति पूजा भारतीय संस्कृति व परम्परा का प्राण है, जब तक ये परम्परा चलती रहेगी भारत स्थायी रूप से विश्व के मानचित्र पर दृष्टिगोचर होता रहेगा। जिस दिन मूर्त्ति पूजा समाप्त कर दी गई उसी दिन भारत भी समाप्त हो जायेगा।

अत: जो भी बिना विचारे मूर्त्ति पूजा रूपी प्राचीन ऋषियो की परम्परा का त्याग कल के एक साधारण वेद पाठी छोरे के कहने से करते हैं वे निश्चित ही किसी भ्रम में हैं। एवं ये निश्चित रूप से भारत की जड़ों को खोखला करने वाला कुत्सित कार्य में संलग्न हैं। मेरा उन सभी बन्धुओं से करबद्ध प्रार्थना है कि वे यदि निराकार उपासना करना चाहते हैं तो करें ये उपासना पद्धति भी हमारे पुराण आदि धर्मशास्त्रों में वर्णित है। किन्तु साकार उपासना की बुराई एवं उसे समाप्त करने का प्रयास नहीं करें।


डॉ.दिलीप कुमार नाथाणी विद्या वाचस्पति

मंगलवार, 18 अगस्त 2020

वैदिक इण्डोलोजी

 
सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—1

झठार्थ तम भंजनम्

सनातन परम्परा मे मूर्ति पूजा का बेहद महत्त्व है। आस्तिक एवं नास्तिक दो विचारकों में जो ईश्वर को मानता है। वह आस्तिक एवं जो नहीं मानता व नास्तिक कहलाता है। एवं वेद के सभी विद्वानों ने मूर्त्ति पूजा को आस्तिक विचारधारा की श्रेणी में रखा है। ये सम्भव है कि कुछ ने मूर्त्ति पूजा को अनुचित माना है किन्तु वे  निराकार उपासक भी मूर्त्ति पूजकों  को नास्तिक नहीं कह सके।

 वेदव्यास, शंकराचार्य,रामानन्दाचार्य, गौड़पादाचार्य, वल्लभाचार्य आदि सभी आचार्यों ने मूर्ति पूजा का समर्थन किया। ये सभी वेदों व उपनिषदों के पारगामी विद्वान् थे एवं इनके सारे मतों की स्थापना वेद के मन्त्रों के आधार पर प्रमाणित हैं। यही कारण है कि शैव, शाक्त, वैष्णव, सौर्य, गाणपत्य आदि जितने मत मतान्तर प्रचलन में आये एवं उन्होंने महान् भारत में अपनी स्थापना करने में सफलता प्राप्त की तो उनके लिये सर्व प्रामाणिक ग्रन्थ वेद ही थे। वेद की ही ऋचाओं व मन्त्रों को उन्होंने अपने दर्शन में प्रमाण माना। अत: किसी भी विचारधार की प्रामाणिकता तभी स्वीकार्य होती है, जब उस मत के स्थापक वेद की ऋचाओं, ब्राह्मण ग्रन्थेां व उपनिषदों स्मृतियों व पुराणों के आधार पर अपने सिद्धान्त की स्थापना करता है। यदि कोई दर्शन अथवा विचारधारा वेद का प्रमाण नहीं मानती तो उसे नास्तिक कहा जाता है। इस सन्दर्भ में मनु का उदाहरण है— नास्तिको वेद निन्दक:

अब ये प्रश्न है कि आधुनिक वेद विचारकों में से मात्र एक केा मूर्त्ति पूजा के विरोध का विचार  हुआ है। उसके अनुचर भी उन्हीं की तरह बातें करते हैं। एवं विरेाध आदि कुतर्क करते हैं। हमारी दृष्टि मे हम उन्हें वेद के पाखण्डी भक्त कहते हैं। अथवा उन्हें जनेऊ धारी म्लेच्छ भी कहा जा सकता है।

मूर्त्ति पूजा विरोधियों का एक ग्रन्थ है उसकी अनुक्रमणिका में ही  आस्तिक नास्तिक विभाजन में चार्वाकों, बौद्धों व जैनों को नास्तिकों की श्रेणी में  रखा है। इस द्वादश अध्याय से पूर्व किसी भी मूर्त्ति पूजक को नास्तिक नहीं कहा है। तो जहाँ से ग्रन्थ का वर्गीकरण प्रारम्भ होता है। वहीं से लेखक के मन में यह स्पष्ट है कि मूर्त्ति पूजा व मूर्त्ति पूजक नास्तिक नहीं है। एवं इस प्रकार से जो ईश्वर की साधना कर रहा है। वह साधक आस्तिक है। यदि ऐसा नहीं होता तो पुस्तक के लेखक महोदय नास्तिक समुल्लासों में पुराण समर्थक विचारकों को भी नास्तिकों के साथ ही रखते। अपितु उन्हेांने ऐसा नहीं करके आस्तिक खण्ड में उनका विरोध किया है। उन्हें नास्तिक नहीं माना है।

यहाँ आज मूर्त्ति पूजा व पुराणों के मण्डन विषयक चर्चा की यह प्रथम स्थापना है। मेरा प्रयास यही रहेगा कि मैं सनातन आर्य शास्त्रो के प्रमाणों से पूर्व उन्हीं पाखण्डी पुस्तकों एवं सोशल साईटों पर हमारे पुराण आदि धर्मशास्त्रों के सन्दर्भ में अनर्गल प्रलाप पूर्ण रूप से उत्पन्न प्रश्नों में व्याप्त विप्रतिपत्तियों को उजागर किया करूँ जिससे स्वयमेव ही सिद्ध हो जायेगा कि जो सनातनी आर्य ग्रन्थो स्मृतियों व पुराणों के सन्दर्भ में जो उस पुस्तक में कहा गया है। वह मिथ्या है।

वस्तुत: मूर्ति पूजा एवं पुराणों का विरोध जहाँ जहाँ अथवा जिसके द्वारा किया जा रहा है। वे सभी संस्थान जाने अनजाने हिन्दू धर्म, आर्य विचारधारा, वैदिकज्ञान, भारतीय परम्परा एवं संस्कृति व भारत देश के शत्रु हैं।

सत्यता ये है कि जब से भारत में वेदेतर समाज का प्रादुर्भाव हुआ तभी से उन्होंने मूल वैदिक ज्ञान जो कि वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, वेदांग, दर्शन, स्मृतियों एवं पुराणों आदि के रूप हमारे पास सुरक्षित है। उसका एवं उस पर आधारित मूर्त्ति पूजा आदि साधना प​द्धतियों का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया। इसी प्रकल्प में जब बाहर से बर्बर आक्रमणकारियों में सम्मेलन हुआ तब इसमें अधिक वृद्धि हुई । उस पर जब धर्मान्तरण वाली गुण्डी गैंग का पर्दापण हुआ तो फिर तो उसमें शतगुना बढ़ोतरी हुई। वर्तमान में कई लोग इस प्रकार के कार्य में लगे हुये हैं।

इसीलिये मेरे मन में यह विचार जाग्रत हुआ कि​ शास्त्रों में प्रदत्त तर्कों के आधार इनके झूठ को सभी के सामने प्रस्तुत किया जाय।

इसी हेतु प्रयत्नशील हुआ हूँ। आप सभी का सहयोग एवं प्रतिक्रिया अपेक्षित है।

क्रमश:


डॉ.दिलीप कुमार नाथाणी (D.Litt. Sanskrit)