सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—7
कुछ वेद पाखण्डी जो कल पैदा हुये उन्होंने अपने अहंकार एवं अपने मत व सम्प्रदाय की स्थापना के लिये के लिये अँग्रेजों से प्राप्त धन व सहायता के आधार पत्रक छपवा कर बाँटे जिसमें परम्परया लक्षाधिक वर्षों से प्रचलित ज्योतिष शास्त्र को एवं हनुमान्, भैरव तथा भगवती पराम्बा को झूठा सिद्ध करने का कुतर्क प्रस्तुत करते हुये कहा कि—
वेद नाम पर पाखण्ड करने वाले का कुतर्क— ये सब मिथ्या है, एवं यदि किसी को भूत बाधा हो तो उपरोक्त में से किसी देव या देवी के सिद्ध साधक के पास जाकर उपचार करवाये तो वह साधक निम्न जाति का है एवं उसे पैसे, मदिरा एवं माँस देकर अपना धन नष्ट करते हैं एवं रोग बढ़ाते हैं।
सत्य सनातन सिद्धान्ती:— सर्वप्रथम यहाँ ये लोग उच्च व निम्न जाति के भेद को उत्पन्न कर रहे हैं। एवं उसके लिये जो वे मदिरा, वस्त्र मिठाई, माँस आदि की माँग सम्बन्धी विचार प्रस्तुत कर रहे हैं तो निश्चित ही वे अपने मत को सिद्ध करने के लिये ऐसे ही किसी अपराधी के पास गये होंगे अथवा गये भी या नहीं वे ही जाने। परन्तु सत्य तो यह है कि हनुमान्, भगवती पराम्बा, भैरव आदि की उपासना करने वाले बहुतायात में दूध की बनी हुई वस्तुओं का प्रसाद रूप में प्रयोग करते हैं। एवं जिन—जिन स्थानों पर ऐसे साधक बैठे हैं चाहे सालासर बालाजी, अथवा अजमेर के निकट श्मशान भैरव वहाँ आपसे आपके कष्ट निवारणार्थ किसी से कोई पेैसे, वस्त्र, धन, मदिरा, माँस आदि नहीं लिये जाते। यही नहीं, वहाँ श्मशान भैरव का साधक कोई तथाकथित किसी निम्न अथवा उच्च वर्ण का है अथवा नहीं परन्तु एक उद्योगपति अवश्य है। एवं वहाँ मानव मात्र के कल्याण के लिये साधना करते हुये कुछ समय बिताकर पुन: अपने व्यापार में व्यस्त हो जाते हैं। परन्तु किसी वेद के नाम पर पाखण्ड फैलाने वाले लोगों में सत्य को स्वीकारने व देखने की शक्ति नहीं होने से कोई वहाँ जाकर सत्य नहीं देखता।
अब हम आते हैं कि ये देवी देवता क्या हैं? तो इसका समाधान करेंगे कि ये वास्तव में प्राणात्मक ऊर्जा का स्वरूप है। जिसे पण्डित मधुसूदन ओझा जी, पण्डित मोतीलाल शास्त्री जी ने इस ऊर्जा को व्यापकता के साथ वेद विज्ञान के आधार पर समझाया है। परन्तु अँग्रेजों द्वारा हिन्दू समाज में आपस में वैर उत्पन्न करके हानि पहुँचाने के लिये बने सम्प्रदाय के लोगों के मन में ये सत्य कदापि नहीं आ सकता। क्योंकि अँग्रेजों द्वारा प्रदत्त धन सहायता के लिये इन्हें निष्ठावान् बनना होगा। इसीलिये ये वेद नाम के आवरण को ओढ़ कर सत्य सनातन हिन्दू धर्म की बुराईयाँ ही करेंगे।
यहाँ इन मूर्खों को ये बताया जाय कि आयुर्वेद में शरीर की कई प्रकार की चिकित्साओं में से भूत चिकित्सा का भी वर्णन प्राप्त होता है। अन्य किसी प्रकार के असन्तुष्ट आत्मा के मोक्ष सम्बन्धी वर्णन भागवत् महापुराण में प्राप्त होता है। जहाँ ब्राह्मण द्वारा भागवत् पाठ एवं दान मात्र का उल्लेख है। एवं उसमें पुरूष सूक्त से यज्ञ का भी विधान बताया गया है। अब उसमें कहाँ वस्त्र, धन, मिष्टान्न, मदिरा, माँस आया। किन्तु इन कुतर्कियों के पास कदापि उत्तर नहीं है।
अपितु ब्राह्मणों का भी विरोध करने लगे क्योंकि उनसे शास्त्रार्थ में हार जो गये। अपनी हार के सत्य को ये कभी उद्घाटित नहीं करते। भारत से बाहर के लोगों ने चाहे वे मुगल हों या ईसाई(अँग्रेज) उन्होंने ब्राह्मणों की हत्या की किन्तु उन्हें पोंगा पण्डित नहीं कहा उसका कारण स्पष्ट था कि उन्हें ज्ञात था कि जब तक ब्राह्मण हैं उनके तथाकथित धर्मों की स्थापना नहीं हो सकती।
सत्य सनातन भारतीय वैदिक संस्कृति ही हम हिन्दूओं की संस्कृति है। इसमें वेद, स्मृति व पुराण ही प्रमाण के रूप में मान्य हैं। इनमें वेद सर्वोपरि है तदुपरान्त स्मृति तथा अन्त में वेदों के भाष्य रूप में जाने जाने वाले पुराण माने गये हैं।

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