सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—3
वल्लभाचार्य ने पुराणों की प्रासंगिकता व औचित्य पर प्रकाश
डालते हुये कहा है कि—
यन्न दृष्टं हि वेदेषु तं दृष्टं स्मृतिभि: किल।
उभाभ्यां
यन्न दृष्टं हि तत्पुराणेषु गीयते।
अर्थात् जो हमें वेदों में दिखाई नहीं देता वह स्मृतियों से
समझा जा सकता है एवं जो स्मृतियों ने नहीं दिखाई देता वह पुराणों में वर्णित है।
इस श्लोक का तात्पर्य है कि वेदों में सारा ज्ञान सूत्रात्मक रूप से वर्णित है।
ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति उसको समझने में सक्षम नहीं हेाता है तो उस ज्ञान को
उन्हीं ऋषियों ने सरल रूप से स्मृतियों में प्रस्तुत किया गया है। जब कोई साधारण
मति मनुष्य जो कि वेद के ज्ञान को समझना चाहता है किन्त उतना श्रम व तपस्या नहीं
कर सकता तो उसके लिये ऋषियों के द्वारा पुराणों की रचना की गई। इस प्रकार यह
पुराणों का महत्त्व, प्रासंगिकता व
औचित्य सभी को प्रकट करता है। अब मैं पुराणों के सम्बन्ध में प्राचीन ग्रन्थों में
क्या कहा गया है उसके प्रमाण दूँगा। क्योंकि जिन्होंने सत्यार्थ प्रकाश पढ़ा
उन्होंने पुराणों के सन्दर्भ में मात्र वही तथ्य पढ़ें जिन्हें लेखक ने लिखा। किसी
भी विषय के सन्दर्भ में पक्ष व विपक्ष दोनों को पढ़े बिना निर्णय करना असम्भव व
अनुचित है। पुराण विषयक जो विपक्ष है उसे सत्यार्थ प्रकाश में दिया गया है। इसके विपरीत न्यून से न्यून
2500 वर्षों से जो पुराण प्रत्यक्ष हैं उसके लिये बिना विचारे मात्र एक लेखक के
द्वारा प्रस्तुत चन्द पंक्तियों के आधार पर उस परम्परा का त्याग करना कथमपि उचित
नहीं है। अत: मैं यहाँ पुराणो के पक्ष की स्थापना करना
चाहता हूँ। पुराणों के सन्दर्भ में प्राचीन ग्रन्थेां मे जो प्रमाण दिये गये वे
निम्न प्रकार हैं।
1.मत्स्य पुराण मे कहा है कि वेद के ज्ञान को सरलता से
समझने के लिये ही धर्मशास्त्रो व पुराणेां की रचना की गई—
अंगानि चतुरो वेदा: पुराणन्याविस्तरा:।
मीमांसा
धर्मशास्त्राणि परिगृह्यात्मसात्कृतम्।
वेद के छ: अंगों के साथ ही उसके समझे जाने के प्रसंग से चार
अंगों की भी स्थापना की गई है। वे हैं पुराण, न्याय दर्शन, मीमांसा व धर्मशास्त्र (स्मृतियाँ)।
2. पाणिनी अष्टाध्यायी के चतुर्थ अध्याय के तृतीय पाद का 105 वाँ श्लोक है '' पुराणप्रोक्तेषु ब्राह्मणकल्पेषु'' इस सूत्र का अर्थ है पुराणों, ब्राह्मण व कल्पों में यहाँ ये तीनों ही ग्रन्थ हैं। वैसे कई सनातन पुराण परम्परा विरोधियों ने अपनी पुस्तकों में इस सूत्र के पुराण शब्द का अर्थ भी ब्राह्मण ग्रन्थ ही किया है। किन्तु पाणिनि जैसे व्याकरणाचार्य जहाँ एक मात्रा तक की त्रुटि नहीं कर सकते वे एक ही ग्रन्थ को प्रस्तुत करते हुये पर्यायवाची शब्द का प्रयोग करते हुये दो बार एक ही ग्रन्थ का उल्लेख क्यों करेंगे।
3.याज्ञवल्क्य शिक्षा के प्रकार को समझाते हुये अपने स्मृति
ग्रन्थ याज्ञवल्क्य स्मृति में लिखते हैं कि पुराण 14 प्रकार की शिक्षाओं में से
एक अंग है—
पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्रांगमिश्रिता:।
वेदा: स्थानानि
विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश।
(याज्ञवल्क्य स्मृति, वीरमित्रोदय परिभाषा प्रकाश, भाग—1पृ11
अर्थात् पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, छ: वेदांग व चार वेद ये कुल 14 विद्या व धर्म प्राप्ति के
साधन हैं। इसी श्लोक की प्राप्ति विष्णुपुराण में भी होती है। विष्णु पुराण ने छ:
वेदांगों के साथ चार उपवेदों केा जोेड़कर विद्या व धर्म के 18 स्थल अथवा साधन बताए
हैं—
अंगानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्याविस्तर:।
धर्मशास्त्रं पुराणं च विद्या ह्येताचतुर्द्दश:।।
आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वश्चेति ते त्रय:।
अर्थशास्त्र चतुर्थ तु विद्या ह्यष्टदशैव ता:।।
विष्णु पुराणम्
अर्थात् चारवेद, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र (स्मृतियाँ), पुराण, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद, अर्थशास्त्र इस प्रकार विद्या के कुल अट्ठारह प्रकार कहे
गये हैं। वीरमित्रोदय कार मित्रमिश्र ने विष्णु पुराण के इस श्लोक पर टीका करते
हुये कहा है कि इसमें प्रथम चौदह प्रकार तो विद्या व धर्म दोनेां की प्राप्ति करात
हैं। एवं शेष चार अर्थ को समझाते हैं, तथापि ये धर्म के अनुषांगिक हैं।
4. अब अन्त में पण्डित भगवद्दत्त जो कि आर्यसमाजी हैं एवंं
वैदिक वाङ्मय का इतिहास के प्रथम खण्ड में प्रमाण देते हुये न्याय सूत्र 4.6.62 पर
भाष्य करते हुये एक ब्राह्मण ग्रन्थ का प्रमाण देकर वात्स्यायन मुनि लिखते हैं— य एवं मन्त्रब्राह्मणस्य द्रष्टार: प्रवक्तारश्च ते
खल्वितिहासपुराणस्य धर्मशास्त्रस्य चेति। अर्थात् जो मन्त्र द्रष्टा ऋषि थे वे ही
इतिहास यानि रामायण महाभारत पुराण व धर्मशास्त्र यानि स्मृतियों के रचनाकार हैं।
पण्डित भगवद्दत्त न्यायभाष्य का एक अन्य उदाहरण देते हुये लिखते हैं— य एवाप्ता वेदार्थाना द्रष्टार: प्रवक्तारश्च त
एवायुर्वेदप्रभृतीनामिति। अर्थात् जो वेदार्थ द्रष्टा तथा प्रवक्ता हैं वे ही
आयुर्वेद आदि के भी हैं। इन दोनों वचनों से यही तात्पर्य स्पष्ट होता है कि आप्त
यानि साक्षात्कृतधर्मा लोग वेदार्थ के द्रष्टा भी थें वह वेदार्थ उन्होंने
धर्मशास्त्रों में प्रकट किया। इसीलिये वे ऋषि ही महर्षि कहलाये। पण्डित भगवद्दत्त
ने गौतम बुद्ध का वाक्य इस सम्बन्ध में प्रमाण रूप में प्रस्तुत किया है जोकि इस प्रकार है— वेद और ऋषियों के विषय में तथागत बुद्ध की सम्पत्ति के विषय
में शान्तरक्षित अपने तत्तवसंग्रह में लिखता है—यथोक्तं भगवात—इत्येते आनन्द पौराणा महर्षयो वेदानां कर्त्तारो मन्त्राणां
प्रवर्तयितार:। ( वैदिक वाङ्मय का इतिहास—1, पृ—14) अर्थात् बुद्ध ने कहा— हे आनन्द! ये पुराणो के रचयिता महर्षि थे, जिन्होंने पूर्व में वेद बनाए, और मन्त्रों को प्रवृत्त किया। इसमें वेदकर्त्ता से तात्पर्य वेद की शाखा का प्रवर्तन है।
5. युधिष्ठिर मीमांसक— ये भी परम आर्यसमाजी हैं इन्होंने व्याकरण शास्त्र का
इतिहास नामक ग्रन्थ लिखा है उसमें इन्होंने शतश: प्रमाण पुराणों के आधार पर
प्रस्तुत किये हैं। आचार्य वात्स्यायन के प्राचीन ऐतिह्य—सिद्ध सिद्धान्त की पुष्टि में न्यायभाष्य से
पूर्वकालिक प्रमाण प्रस्तुत करते हुये
लिखते हैं कि जैमिनि शाखा व उसके ब्राह्मण ग्रन्थ के प्रवक्ता भारतयुद्धकालीन
महामुनि जैमिनि ने पूर्वमीमांसा के कल्पसूत्र—प्रामाण्याधिकरण में लिखा है कि— अपि वा कर्तृसामान्यात् तत् प्रमाणमनुमानंस्यात्। (पूर्व
मीमांसा कल्पसूत्र प्रमाण्याधिकरण 1.3.2) अर्थात् कल्पसूत्रों की जिनका मूल आम्नाय
में नहीं मिलता,
वे अप्रमाण नहीं हैं।
आम्नाय और कल्पसूत्रों के कर्त्ता प्रवक्ता समान होने से, आम्नाय में अनुक्त कल्पसूत्र की विधियों का भी प्रामाण्य
है। अर्थात् जिन ऋषियों ने आम्नाय यानि वेद की शाखाओं और ब्राह्मण ग्रन्थों का
प्रवचन किया,
उन्होंने ही कल्पसूत्रों
की भी रचना की,
अत: यदि उनका वचन ग्रन्थ
में प्रमाण है,
तो दूसरे में स्वयंसिद्ध
प्रमाण है।
आज मैंने वे प्रमाण
दिये हैं जो आधुनिक युग के लोगों ने पुराणों की प्रामाणिकता के सन्दर्भ में
प्रस्तुत किये हैं। ये सभी भारतीय विचारकों के हैं। किन्तु भारतीय धर्मदर्शन व
पुराणों के परिप्रेक्ष्य मे जो वैदेशिकों ने सत्यार्थ कार्य किया है वह मैं आगे प्रस्तुत करूँगा।
डॉ.दिलीप कुमार नाथाणी

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