बुधवार, 23 दिसंबर 2020

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना —4

 

सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना —4

पुराणों की पौराणिकता, भारतीय धर्म दर्शन में उनकी प्रासंगिकता एवं भारतीय जनमानस में पुराणों का अन्तर्ग्रन्थन सम्बन्धी अभी कई तथ्य प्रस्तुत किये गये हैं। पुराणों के सन्दर्भ में भारतीयों में अन्य कई विद्वान् हुये हैं जिन्होंने इनकी पौराणिकता के सन्दर्भ में पर्याप्त तर्क सप्रमाण प्रस्तुत किये हैं। इनमें कल हमने कुछ विद्वानों को पढ़ा था। आज भी कुछ भारतीयों के प्रमाण प्रस्तुत कर पाश्चात्यों के मत प्रस्तुत करेंगे।

पाण्डुरंग वामन काणे:— महामहोपाध्याय पी.वी. काणे के अनुसार निरुक्त से प्रकट होता हैं कि यास्क से बहुत पहले रिक्थाधिकार (यानि हिस्सेदारी) के प्रश्न को लेकर विचार—विमर्श हुये तथा पुत्रों एवं पुत्रियों को रिक्थ—निषेध तथा पुत्रिका को अधिकार प्राप्त हो सकता है। रिक्थाधिकार सम्बन्धी यही विचार—विमर्श कालान्तर में लिपिबद्ध हो गये हों। रिक्थसम्बन्धी ( हिस्सेदारी अथवा विल) वार्त्ता की ओर यास्क ने जिस प्रकार संकेत किया है, इससे यही सिद्ध होता है कि उन्होंने कुछ ग्रन्थेां की ओर निर्देश किया है, जिनमें वैदिक वचनो के उद्धरण दिये गये थे—

अथैता जाम्या रिक्थप्रतिषेध उदाहरन्ति ज्येष्ठ पुत्रिकाया इत्येके। एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि रिक्थ के विषय में यास्क ने एक पद्य का उद्धरण दिया है, जिसे वे ऋचा न कहकर श्लोक कहते हैं—तदेतदृक्थलोकाभ्यामभ्युक्तम्। अंगादंगात्सम्भवति..... स जीव: शरद: शतम्। अविशेषेण पुत्राणं दायो भवति धर्मत:। मिथुनानां विसर्गादौ मनु: स्वायम्भुऽवोब्रवीत्। निरुक्त 3.4.5.

इससे स्पष्ट हो जाता है कि धर्म—सम्बन्धी ग्रन्थ श्लोक—छन्द में या श्लोकों में प्रणीत थे। यदि धर्म—सम्बन्धी ग्रन्थ यास्क के पूर्व विद्यमान थे, तो धर्मशास्त्रीय ग्रन्थेां की तिथि विक्रम से कई शताब्दियाँ पूर्व की मानी जायेगी।  इस विषय में अन्य प्रमाण भी हैं, यथा गौतम, बौधायन तथा  आपस्तम्ब के धर्मसूत्र जिनमें धर्मशास्त्रों की पुराण व इतिहास के रूप में चर्चा की गई है।

गौतमधर्मसूत्र:— तस्य च व्यवहारो वेदो धर्मशास्त्राण्यंगानि उपवेदा: पुराणम्। गौतम धर्मसूत्र 9.21

इस सूत्र  में आचार्य गौतम ने पुराणों को उपवेद भी कहा है। तथा उन्हें धर्मशास्त्र भी कहा गया है। अत: सूत्र ग्रन्थ यानि कल्प नामक वेदांग में पुराणों को प्रमाण रूप स्वीकार किया गया है।  पुन: बौधायन ऋषि लिखते हैं:— धर्मशास्त्ररथारूढ़ा वेदखड्गधरा द्विजा:। क्रीड़ार्थमपि यद्ब्रूयु: स धर्म: परम: स्मृता:। बौधायनधर्मसूत्र 1.13) अर्थात् धर्मशास्त्र रूपी रथ पर आरूढ होकर वेद रूपी तलवार धारण करने वाले द्विज जो भी कुछ आचरण आदि के सन्दर्भ में कहें। वह सब धर्म ही है। यहाँ बौधायन ने धर्मशास्त्र व वेद से युक्त होना ही द्विज की योग्यता बताई तथा ऐसे व्यक्ति के वाक्यों को ही धर्म कहा। इस प्रकार धर्मसूत्र के धर्मशास्त्रों के होने का प्रमाण प्राप्त होता है। बौधायन ने धर्म की व्याख्या करते हुये स्मार्तो द्वितीय ऐसा कहा है जिसका स्पष्ट अर्थ है कि वेद धर्म का प्रथम उपादान है, तथा स्मार्त्त धर्म द्वितीय है, अत: यह भी पुष्ट प्रमाण है कि सूत्रग्रन्थों के रचना के समय स्मृतिग्रन्थ उपलब्ध थे अथवा धर्मशास्त्र को स्मृति के नाम से कहा जाता था। परन्तु दोनों ही स्थितियाँ धर्मशास्त्रों के सूत्र ग्रन्थो के साथ—साथ होने को प्रमाणित करती है—पूर्वमीमांसा (6.7.6)—शूद्रश्च धर्मशास्त्रत्वात्तत्र। यहाँ भी आश्रम सम्बन्धी नियमों के लिये धर्मशास्त्रों को प्रमाण माना है। यह प्रमाण पूर्वमीमांसा सूत्रकार जैमिनी दे रहे हैं। ​इसका तात्पर्य है कि दर्शन सूत्रों की स्थापना के समय स्मृतियाँ व पुराण वर्तमान थे एवं दार्शनिकों ने वेद की ही भाँति इन्हें भी प्रमाण माना। आपस्तम्ब कहते हैं—पुन: सर्गे बीजार्था भवन्तीति भविष्यत्पुराणे। आपस्तम्ब धर्मसूत्र 2.9.4.6)  आपस्तम्ब धर्मसूत्र में तो आपस्तम्ब ने स्पष्ट रूप से न केवल पुराणों का उल्लेख किया है अपितु पुराण का नामोल्लेख तक कर दिया है। इस प्रकार पी.वी.काणे महोदय ने कई प्रमाण प्रस्तुत किये, उन्होंने उन मतों को नहीं माना, जिनमें यह सिद्धान्त प्रतिपादित करने का प्रयास किया गया कि सूत्र—ग्रन्थो के उपरान्त अनुष्टुप् छन्द वाले गन्थ प्रणीत हुये। इसके विपक्ष में प्रमाण देते हुये पी.वी.काएणे महोदय लिखते हैं कि उन दिनों के ग्रन्थों के विषय में हमारा ज्ञान इतना न्यून है कि इस प्रकार का सामान्यीकरण समीचीन नही है। श्लोक—छन्द वाला ग्रन्थ मनुस्मृति कुछ धर्मग्रन्थों से , जैसे विष्णुधर्मसूत्र से प्राचीन और वसिष्ठधर्मसूत्र का समकालीन है। कुछ प्राचीनतम धर्मसूत्रों में, यथा बौधायन लम्बे लम्बे प्रबन्ध श्लोक छन्द में पाये जाते हैं। एवं उनमे कुछ तो उद्धरण मात्र हैं। यहाँ तक कि आपस्तम्ब में भी बहुत से श्लोक प्राप्त होते हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि श्लोक—बद्ध ग्रन्थ धर्मसूत्रों से पूर्व भी विद्यमान थे। इनके अतिरिक्त तथा बौधायन के समय में धर्म—सम्बन्धी एक बृहत् साहित्य था जो वर्तमान में उपलब्ध नहीं है। (धर्मशास्त्र का इतिहास भाग—1, पी.वी.काणे, पृ.11)

यहाँ बताना आवश्यक है कि जिन सूत्र ग्रन्थों का ऊपर प्रमाण दिया गया है वे सूत्र ग्रन्थ छ वेदांगों में से कल्प नामक वेदांग के अंग हैं अत: जब स्मृतियों व पुराणों का वेदांगों में उल्लेख प्राप्त होता है, तो वह नवीन कृति कैसे हो सकती है। दूसरा वह प्रमाण क्यों नहीं? उसमें झूठ व पाखण्ड कैसे आ गया? आदि आदि प्रश्न उनके लिये हैं जो कुतर्कों के आधार पर पुराणों को मिथ्या प्रवंचना कहते आये हैंं। मेरी इन आलेखों की शृँखला का एक उद्देश्य ''झूठार्थतम भंजनम्'' भी है। अर्थात् पुराणों को अपमानित करने के लिये वैदेशिकों से धन प्राप्त कर जो पुराण विरोधी, सनातन धर्म परम्परा विरोधी ग्रन्थ लिखे गये। उनके कुतर्को का तर्कपूर्णविधि से व सप्रमाण विच्छेद किया जाय।

कल एक पाठक ने प्रश्न किया था कि पुराण किसे कहा है तो उसकी परिभाषा इस प्रकार है— निरुक्तकार यास्काचार्य ने पुराण शब्द को समझााते हुये लिखा है—पुरा नवम् इसी प्रकार मालविकाग्निमित्रम् में पुराण शब्द को निर्वचित करते हुये कहा है पुराणामित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम् ।। मालविकाग्निमित्रम् 1.2।। रघुवंशम में कालिदास ​ने लिखा है पुराणपत्रापगामादनंतरम्।। 3.7।।  श्रीमद्भगवत् गीता में भी पुराण शब्द को समझाया गया है—'' वयोवृद्ध, पुरातनख् अजो नित्य: शाश्वतो5यं पुराण:।।2.20।। इस प्रकार पुराण शब्द विभिन्न अर्थों में प्रकट हुआ हैं किन्तु पुराण शब्द का धर्मशास्त्रीय रूप में अर्थ मत्स्य पुराण में लिखा है—

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि। 

वंशानुचरितंचैव पुराणं पंचलक्षणम्।। 

जिन ग्रन्थेा में सर्ग अर्थात् सृष्टि उत्पत्ति , प्रतिसर्ग यानि सृष्टि का लय होना, वंश ,मन्वनतर और वंशचरित इन पाँचो का उल्लेख प्रापत होता है। वही पुराण हैं। इसीलिये याज्ञवल्क्य स्मृति के श्लोक पर वीरमित्रोदयकार ने टीका करते हुये लिखा''पुराणं ब्राह्मादि वक्ष्यमाएा''।

मेरे इन आलेखों से कई झूठार्थतमानुयायियों की स्थिति विकट हुई है। एवं वे तर्क करने, मेरे आलेखों का प्रत्युत्तर देने की अपेक्षा मेरे ऊपर व पुराणों पर अनर्गल टिप्पणियाँ कर रहे हैं। मेरा यह मानना है कि इस महान् भारत की भारती सन्तति है उसमें निराकार व साकार उपासक साथ साथ रहते आये हैं। साकार उपासकों को कभी निराकार उपासकों से न तो वैर रहा है। न ही रहेगा। किन्तु निराकार उपासकों की स्थिति अत्यन्त वैषम्यपूर्ण, द्वेष, ईर्ष्या युक्त है। एवं उनको पुराणो व मूर्त्ति पूजा से वैर है इसके विरोध हेतु विवेकान्ध वे किसी निम्नस्तर तक पहुँच सकते हैं। अपित पहुँच रहे हैं। वर्तमान में महान् भारत को उसकी प्राचीन सनातन परम्परा व संस्कृति ही अपना गौरवपूर्ण शिखर तक पहुँचा सकती है। अत: जो कोई भी निराकार उपासक अनावश्यक रूप से साकार उपासना व मू​र्त्ति पूजा का विरोध करता है। वह निश्चित ही राष्ट्रद्रोही  व धर्मद्रोही है।


डॉ.दिलीप कुमार नाथाणी विद्यावाचस्पति

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