सनातन परम्परा मे मूर्त्ति पूजा मण्डनम् व पुराण स्थापना—2
यदि किसी थान आदि की चर्चा की जाय तो वहाँ कोई भी आपसे मद्य आदि की माँग
करे तो वह अनुचित है। ये तथ्य सही है। एवं ऐसा करने वाले कुछ दुष्ट प्रकृति के लोग
रहे भी होंगे। किन्तु वर्तमान में दैवी व भैरव आदि के कई स्थलों पर ऐसी किसी वस्तु
को प्रसाद के रूप में चढ़ाने वहाँ बाँटने आदि के लिये स्पष्ट मना किया जाता है।
तथापि सारे तथ्य उन लोगों के सन्दर्भ में दिये जा रहे हैं जो मूर्त्ति पूजा के नाम
पर पाखण्ड करते हैं। एवं ऐसे जितने भी लेखक महोदय हैं उन्होंनेउन्हीं पाखण्डों को अनुचित ठहराया है।
किन्तु उनके अनुयायियों ने ग्रन्थ में वर्णित पाखण्डी लोगों की तरह सभी प्रकार की
मूर्त्ति पूजा व मूर्त्ति पूजकों को मान लिया, एवं उसके लिये कुतर्कों की पुस्तकें रच डाली उसका लाभ म्लेच्छों ने लिया और
पहले तो मूर्त्ति पूजा का एवं उसके उपरान्त पूर्ण सनातन संस्कृति व परम्परा का
विरेाध करने लग गये हैं।
यहाँ लेखक ने मूर्त्ति पूजा के आधार पर ढोंगी लोगों के कर्मों को समझाया है इन
बन्धुओं ने उसे मूर्त्ति पूजा के सम्पूर्ण
क्रम को ही इन ढोंगियों के अनुसार ग्रहण कर लिया। मूर्त्ति पूजा पूर्णत: एक
विज्ञान है। इसी कारण मूर्त्तियाँ कैसी हों, किस पत्थर से बनी हों, किस देवता की मूर्त्ति
किस पत्थर व किस किस आकार की हों। कुछ देवता यथा महादेव, विष्णु आदि के स्थायी निवास जिन जिन नदियों अथवा भू—प्रदेशों में होने से उन उन नदियों के
पत्थर तत्समबन्धी देवताओं के विग्रह ही
हैं। उनकी स्थापना आदि की आवश्यकता नहीं होती। विभिन्न देवी—देवताओं की मूर्त्तियों के अंग यथा हाथ हाथों की मुद्राएँ
आदि कैसी हों उनके नेत्र व मुख किस दिशा में हों। उनके कौन कौन से अस्त्र किस हाथ
में हों इस प्रकार की प्रत्येक दशा का विभिन्न परिणाम आदि का वर्णन हमें
कई ग्रन्थों में प्राप्त होता है। जिनमें गरुड़ पुराण, अग्नि पुराण में सर्वाधिक है। इसके अलावा विभिन्न ग्रन्थ
जिनमें वास्तु से सम्बन्धित ग्रन्थों में मूर्त्तियों की स्थापना व स्वरूप लक्षण
उनके परिणाम आदि पर विस्तृत चर्चा प्राप्त होती है। मूर्त्ति पूजा इतनी ही मिथ्या होती एवं व्यर्थ
होती तो उस पर इतनी अधिक चर्चा क्यों होती। एक ग्रन्थ को पढ़कर सहस्र वर्षों के
ज्ञान को तिलांजलि देना भी तो अन्ध श्रद्धा ही है। अपितु महामूर्खता है।
वेद पर सायण, महीधर, श्रीस्वामी, आदि कई विद्वानों ने अपने भाष्य लिखे एवं
समझाया है परन्तु इनमें से किसी ने मूर्ति पूजा का विरोध नहीं किया। परन्तु एक अंकल जी तो सायण आदि दिव्य व्यक्तित्वों को ही अभद्र शब्दों से ताड़ना करता है।
मुझे तो ये अंकल जी वास्तव में अंकल यानि अन अकल ही दीखते हैं।
सहस्रों वर्षों से देवलायों एवं उनमें देवविग्रहों की स्थापना होती आई है। कई
सहस्राब्दियाँ प्राचीन मन्दिरों के भग्नावशेष हमें प्राप्त होते हैं। यहाँ तक
पाणिनी अष्टाध्यायी में भी इस प्रकार के कई सूत्र प्राप्त होते हैं। यही नहीं पिछली कुछ शताब्दियों से जब से यूरोप
वासी भारत में आये तो उन्होंने यहाँ कि मूर्त्तियाँ चोरी करके यूरोप व अन्य पश्चिमी देशों में मूँहमाँगे
दामेां पर बेची हैं। वहाँ लाल बन्दर जैसे मुँह वाले गोरे उन्हें बड़े ही मान
सम्मान के साथ अपने घरों में स्थापित कर रहे हैं। उनको उसका सकारात्मक लौकिक व
आध्यात्मिक लाभ भी मिल रहा है। पर नहीं हमारे एक व्यक्ति के मन मे आ गया कि साकार
उपासना नहीं करनी तो अब हम प्रयासरत रहेंगे कि मूर्त्ति पूजा का विरोध करेंगे।
चाहे कितने कुतर्क देन पड़ें। कितने ही सत्यों को असत्य कहना पड़े।
ये म्लेच्छों के समय में ही मूर्त्ति पूजा समाप्त करने का एक षडयन्त्र था इसके लिये उन्होंने विभिन्न समाजों, संगठनों, परिषद्, सोसायटियों की स्थापना करके उसके द्वारा मूर्ति पूजा का विरोध करने का प्रयास किया था। किन्तु वह षडयन्त्र असफल रहा। बंगाल में बंकिमचन्द्र चटोपाध्याय, शरतदचन्द्र आदि ने अपने साहित्य मे इनके मत का खण्डन किया एवं ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जैसे समाज सुधारकों ने सामाजिक जन जागृति के द्वारा वहीं इस ब्रह्म समाज की समाधि भी बना दी जहाँ इसकी स्थापना हुई थी। लगभग आधी शताब्दी उपरान्त एक महोदय ने वेद के आधार पर मूर्त्ति पूजा का विरेाध प्रारम्भ किया। उसका प्रभाव पड़ा तो अँग्रेजों को भारतीय संस्कृति को समाप्त करने का ये उत्तम अवसर दिखा एंव उन्होंने किसी भी एक समाज विशेष पर पर कभी भी प्रतिबन्ध नहीं लगाया। यद्यपि अँग्रेजों ने भारतीय शिक्षा पद्धति यहाँ के गुरूकुल, उद्योग धन्धे सभी को समाप्त करने के लिये विभिन्न विधिनियिम बनाये किन्तु अँग्रेजों संस्था के विरूद्ध कोई कठोर व अनुशासनात्मक कार्यवाही नहीं की थी। जिन जिन समाजियों ने अँग्रेज सरकार के विरोध में भारतीय स्वतन्त्रता हेतु जो सत्कार्य किया उनके विरूद्ध व्यक्तिश: स्तर पर कार्यवाही हुई। किन्तु उसका प्रभाव संस्था पर नहीं हुआ।
इसका सर्वाधिक प्रभाव साधुओं के संगठनों पर पड़ा एवं उनपर भयंकर अत्याचार
हुये। वे सभी सन्यासि मूर्त्तिपूजक थे। अँग्रेजों ने भयंकर तरीके से इन सनातनी
सन्यासियों पर अत्याचार किये। एवं इतिहास में से उनका नाम मिटा दिया। अँग्रेज
म्लेच्छों का कार्य एक स्तर पर नहीं होता था उसके कई कई स्तर होते थे। उनके
मस्तिष्क में राजस्थापना के साथ ही यहाँ की मूल संस्कृति व परम्परा व धर्म को
समाप्त करना भी था। वे मूर्त्ति पूजा के सभी सम्भावित प्रमाणों को नष्ट करना चाहते
थे।
इसी क्रम मे जिन सनातनी परम्परा व
मूर्त्ति पूजक संस्थाओं से सम्बन्धित लोगों ने स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लिया
तो उनको पूरी तरह से संस्था सहित समाप्त करने का प्रयास किया गया। जिसमें हिन्दू
महासभा, एवं उनके अनुषांगिक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक
संघ प्रमुख थे। अँग्रेज म्लेच्छों ने इनके कार्यकर्त्ताओं के साथ इन संगठनों को भी
हानि पहुँचाई। हिन्दू महासभा को तो भारत की स्वतन्त्रता के उपरान्त भी प्रतिबन्धित
किया गया।
इसका सर्वश्रेष्ठ प्रमाण है समाज सुधारकों के आधुनिक इतिहास में राजाराम मोहन
राय, , ऐनी बिसेण्ट थियोसोफिकल सोसाइटी ब्रह्मसमाज को
तो पढ़ाया जाता है। किन्तु सावरकर, ईश्वर चन्द विद्यासागर, वेद समाज, हिन्दू महासभा, राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ आदि को नहीं पढ़ाया जाता है।
ये तथ्य स्पष्ट करता हैं कि मूर्त्ति पूजा भारतीय संस्कृति व परम्परा का प्राण
है, जब तक ये परम्परा चलती रहेगी भारत स्थायी रूप
से विश्व के मानचित्र पर दृष्टिगोचर होता रहेगा। जिस दिन मूर्त्ति पूजा समाप्त कर
दी गई उसी दिन भारत भी समाप्त हो जायेगा।
अत: जो भी बिना विचारे मूर्त्ति पूजा रूपी प्राचीन ऋषियो की परम्परा का त्याग
कल के एक साधारण वेद पाठी छोरे के कहने से करते हैं वे निश्चित ही किसी भ्रम में
हैं। एवं ये निश्चित रूप से भारत की जड़ों को खोखला करने वाला कुत्सित कार्य में
संलग्न हैं। मेरा उन सभी बन्धुओं से करबद्ध प्रार्थना है कि वे यदि निराकार उपासना
करना चाहते हैं तो करें ये उपासना पद्धति भी हमारे पुराण आदि धर्मशास्त्रों में
वर्णित है। किन्तु साकार उपासना की बुराई एवं उसे समाप्त करने का प्रयास नहीं
करें।

कोई टिप्पणी नहीं:
नई टिप्पणियों की अनुमति नहीं है.